अपूर्वानंद की काल्पनिक योग्यता लाजवाब है

‘द हिन्दू’ में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफसेर अपूर्वानंद ने एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने बताया है कि भाजपा-आरएसएस द्वारा नाम बदलने की प्रक्रिया एक ‘कल्चरल जिनोसाइड’ है। आगे लिखा है कि कुछ लोग भारत के ‘काल्पनिक इतिहास’ (गुप्त काल और मौर्य साम्राज्य) के इतने मोह में हैं कि उन्हें इस्लामी शासकों के ‘कन्ट्रीब्यूशन्स’ का पता ही नहीं चलता। 

पूरे आर्टिकल में इसी तरह के कुतर्क हैं, जिसका खंडन उन्हीं के आर्टिकल में खुद को ऑथेन्टिक बताने के लिए किसी महान लेखक राफ़ेल लेमकिन की कही गई बात से किया जा सकता है। नीचे के पैराग्राफ़ में लेमकिन को कोट करते हुए अपूर्वानंद बताते हैं जगहों का नाम बदलना या उन्हें ‘रीक्लेम’ करना एक सांस्कृतिक नरसंहार का ज़रिया है। आगे वो बताते हैं कि लेमकिन ने कैसे ये साबित किया है कि किसी भी सांस्कृतिक विरासत को भंग करना उस समूह के शारीरिक/भौतिक विध्वंस के बराबर है। 

पूरी आर्टिकल कोरी बकवास तो है ही, लेकिन ये पैराग्राफ़ पढ़कर मुझे अपूर्वानंद जैसे लोगों की सोच और आर्टिकल लिखने की क्षमता पर सवाल करने लगा कि एक बार खुद ही तो पढ़ लेता कि क्या लिखकर, किस बात को डिफ़ेंड कर रहा है। अरे प्रोफेसर साहब, इस्लामी और ईसाई आक्रांताओं ने ही इस धरती के सांस्कृतिक नरसंहारों की शुरुआत की थी। उसके बाद लगातार आप ही के तर्क के अनुसार इतिहास, धार्मिक प्रतीक, सामाजिक ताना-बाना, शिक्षा पद्धति सब बर्बाद की। इसी को भौतिक विध्वंस कहा जाता है। न कि किसी विरासत को उसका सम्मान वापस दिलाना। 

जी हाँ, मुसलमानों या ईसाईयों को इस देश और संस्कृति में किए गए योगदान का हिस्सा नहीं दिया जा सकता क्योंकि जिन आतंकियों की हम बात कर रहे हैं, उन्होंने कुछ भी सकारात्मक नहीं किया इस संस्कृति के लिए। किस शासक ने इस धरती की संस्कृति बर्बाद करने की कोशिश नहीं की, और किस शासक ने तमाम तरह के प्रतिबंध आदि नहीं लगाए? 

लुटेरों के योगदान को हम स्वीकारें और नालंदा विश्वविद्यालय तोड़ने वालों के नाम पर शहरों के नाम झेलते रहें क्योंकि देश के बीस प्रतिशत लोग मुसलमान हैं? वो हैं मुसलमान, और उनसे समस्या नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि ये देश उनका भी उतना ही है जितना वो इसे अपना समझते हैं। 

अपूर्वानंद लिखते हैं कि भाजपा ‘काल्पनिक इतिहास’ की ख़ुमारी में जी रहा है। किस तरह की घटिया और मरोड़ी हुई सोच है यह जहाँ तुम आतंकियों, बलात्कारियों और लुटेरों को भारत के उत्थान में सहयोग देता देख पाते हो लेकिन गुप्त काल, मौर्य काल आदि तुम्हें काल्पनिक इतिहास का हिस्सा लगते हैं। कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम चुप तो रहो।

नाम बदलना बहुत ज़रूरी है ताकि बलात्कारियों के नाम पर शहर न रहें। पहले जो सांस्कृतिक नरसंहार हुआ, हम उसे पलट रहे हैं। किसी की संस्कृति बर्बाद नहीं कर रहे, अपनी वापस समेट रहे हैं। आक्रमणकारियों के नाम पर कुछ नहीं होना चाहिए। उनके नाम पर सड़कें, शहर और इमारतों के नाम इस देश और समाज के आधुनिक शासकों की बीमार मानसिकता के परिचायक हैं जो वोट के लिए अपनी जड़ों को भूल जाते हैं। 

अपूर्वानंद को दुःख हुआ है कि गुड़गाँव का नाम गुरुग्राम हुआ तो इस ‘पोस्ट मॉडर्निस्ट’ शहर के लोगों ने हो-हल्ला नहीं किया। लगता है पोस्टमॉडर्निज्म का एक ही अर्थ प्रोफेसर साहब को समझ में आता है कि हर बात पर वो हो-हल्ला करते रहें। ऐसा नहीं होता है सर। बंबई मुंबई बनी, मद्रास चेन्नई हुआ, कलकत्ता कोलकाता हुआ, बंग्लोर बेंगलुरु हुआ। ये सारे शहर गुड़गाँव से बड़े और मॉडर्न शहर थे, इनके नाम भी सांस्कृतिक कारणों से ही बदले गए। 

देशों के नाम बदले जाते हैं, राजधानियों के नाम बदले जाते हैं, शहरों के नाम बदले जाते हैं क्योंकि इतिहास सिर्फ तारीख़ और युद्धों के नाम याद करने का विषय मात्र नहीं है। ये हर उस घटना को याद करने का तरीक़ा है जिसके कारण हम जो हुए, और जो होंगे, वो कैसे, कब और क्यों हुए। 

आप लिखते हैं कि हरियाणा के एक गाँव में मुसलमानों के नाम हिन्दुओं जैसे हैं, वो चाहते हैं कि इस संस्कृति का हिस्सा बनकर रहें। आपको एक और नायाब बात बताता हूँ, जो आप मिस कर गए। इंडोनेशिया बहुत बड़ा मुसलमान देश है, और वहाँ के नामों को देखिए कभी कि किस तरह के हैं। उनके नाम से उनकी संस्कृति झलकती हैं क्योंकि उन्हें अपनी जड़ों का भान है। 

मैं मुसलमानों के नाम पर नहीं जाता पर बीस करोड़ आबादी में कुछ हजार लोगों के हिन्दू जैसे नाम से आपके कल्चरल एस्सिमिलेशन की ख़ुशबू नज़र आ जाती है तो बताता चलूँ कि चीन के मुसलमानों के नाम चीनी होते हैं, जापान के मुसलमानों के नाम जापानी, रूस के मुसलमानों के नाम रूसी होते हैं। लेकिन भारत के मुसलमानों के नाम भारतीय नहीं हैं, अरबी हैं। इसलिए फ़र्ज़ी के तर्क मत घुसाइए, क्योंकि आप अपने ही आर्टिकल में पाँच बार, अपने ही बातों से गलत साबित हो चुके हैं। 

हर घटिया शासक के नाम को उसी क्रूरता के साथ मिटाने की ज़रूरत है, जैसे कि उन्होंने मिटाया था। अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनी तो उस मस्जिद के ईंटों की धूल भी वहाँ नहीं होनी चाहिए। सीधी सी बात है कि जब वो सत्ता में थे, उन्होंने हमारी संस्कृति को मिटाने की हर संभव कोशिश की, अब हम सत्ता में हैं तो हम उसे वापस लेंगे। हम किसी की संस्कृति बर्बाद नहीं कर रहे, किसी मुसलमान या ईसाई को यहाँ से भगा नहीं रहे। 

हम बस इतना बता रहे हैं कि हमारे साथ जो सांस्कृतिक नरसंहार हुआ, उसको सही करने का ये सही वक्त है। इस देश के हिन्दुओं और मुसलमानों की संस्कृति एक है, और वो है भारतीय संस्कृति। यहाँ बीच के सालों में अगर कोई गाँवों को उजाड़ता रहा, सामूहिक नरसंहार किए, बलात्कार किए, तलवार की नोक पर बस्तियों को मुसलमान बनाया, तो उनके नामों पर थूकने के अलावा और कुछ नहीं होना चाहिए। वो तमाम नाम हमारी घृणा के लायक ही हैं, उन्हें हर जगह बोर्ड पर लिखा देखना ये बताता है कि हमारी सरकारें कितनी निकम्मी रही हैं क्योंकि उन्हें लगा कि बीस प्रतिशत मुसलमानों का वोट उन्हें आजीवन सत्ता में रखेगा। 

और हाँ, कोई मुसलमान ये सोचता है कि इन आक्रांताओं ने अच्छा किया और इनके नाम के स्मारक होने चाहिए, तो मेरे पास उनके लिए घृणा के अलावा और कुछ भी नहीं।

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