दलित अस्मिता का विरोधाभास: नौकरी में आरक्षण, सड़कों पर आगजनी

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बीस साल पहले पिछड़ी जातियों का जो आर्थिक और सामाजिक स्तर था, वो आज के दौर में नहीं रह गया है। दोनों में लगातार अलग-अलग सरकारों की नीतियों से बदलाव आता रहा है। नरेगा जैसी योजनाओं ने अगर उन्हें रोजगार की गारंटी दी, तो जनधन ने ये सुनिश्चित किया कि जो पैसा रास्ते में चोरी हो जाता था, वो अकाउंट में मिल रहा है। 

मैं बहुत अंदर तक नहीं जाऊँगा, और आप सबको अपने ही समाज में ऐसी जनसंख्या के स्तर में बदलाव को देखने कहूँगा। मैंने ये बदलाव बिहार में होते देखा है। अपने गाँव, ज़िले की बात करूँ तो सामाजिक न्याय के मसीहा लालू के राज में इनकी स्थिति बदतर थी। ये मात्र वोटबैंक थे, और इनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि अगर दिन में मज़दूरी का काम न मिले तो शाम में भोजन का पता नहीं था। 

बाद में, धीरे-धीरे ही सही, आर्थिक स्तर सुधरा, शिक्षा के क्षेत्र में ये आगे बढ़े और हालत अभी पहले से बहुत बेहतर है। उदाहरण के तौर पर मेरे गाँव में ऊँची जाति के लोगों को अपने गाय, खेत आदि की देखभाल के लिए मज़दूर नहीं मिलते। वो इसलिए कि अब कोई भी ऊँची जाति के लिए मज़दूरी नहीं करना चाहता। अब मज़दूर वही है जो मजबूर है। और जो ऊँची जाति के घर पर रहकर मज़दूरी करता है उसे अपनी ही जाति में एक तरह से नीचा दिखाया जाता है। ये मेरे गाँव में होता है, कहीं से कही-सुनी बात नहीं बता रहा। 

ये भी एक सत्य है कि ऊँची जातियों का दम्भ अभी भी पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ है। कप के नीचे में निशान लगाने के दौर से हम बाहर आ गए हैं, लेकिन अभी भी एक नीची निगाह से उन्हें देखा जाना, या कुछ बुरा-भला कह देना, बिना किसी बात के गाली देना, अभी भी कुछ-कुछ बाकी है। इस बात से भी इनकार नहीं है कि पूरे भारत में स्थिति नहीं सुधरी है क्योंकि इन जातियों के लोगों को अभी भी कई जगह सर झुकाकर निकलना होता है। 

अब अगर आज की बात करें जहाँ सुप्रीम कोर्ट के एक तार्किक फ़ैसले के विरोध में सड़कों पर इन जातियों की भीड़ ने आग लगाने से लेकर, बसों से छात्रों को उतारकर पीटने और पिस्तौल चलाने का काम किया है, वो किसी जाति की अस्मिता का आक्रोश नहीं, एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा लगता है। जो लोग इन इलाकों में हैं, वो प्रदर्शनकारियों से पूछते हैं कि क्यों कर रहे हो ये सब, तो पता चलता है कि उनके अनुसार सरकार आरक्षण ख़त्म कर रही है। 

हम व्हाट्सएप्प युग में हैं, और पिछड़ी जातियों के लोगों के हाथ में भी फोन है। फोन होने के साथ ही उन्हें बार-बार याद दिलाया जाता है कि आरक्षण तुम्हारा हक़ है। कुछ पढ़े-लिखे लोग तो रीप्रेजेन्टेशन के नाम पर नौकरियों में कौशल की जगह चुनाव की प्रक्रिया जैसी व्यवस्था की तरफ इशारा कर देते हैं। 

आरक्षण एक हक़ नहीं, कोढ़ है इस समाज का। वो इसलिए नहीं कि मैं इसका सताया हुआ हूँ, बल्कि इसलिए कि इसका सबसे बड़ा घाटा इन्हीं जातियों को हुआ है। अगर सामाजिक वैमनस्यता और भेदभाव आज भी पढ़े-लिखे छात्रों के मन में है तो उसका एक कारण आरक्षण है। आप कैसे ये समझा देंगे किसी बच्चे को कि उसके ज़्यादा नंबर, विषय की बेहतर समझ, किसी कम नंबर वाले बच्चे की तुलना में कम हैं? 

जिसका हक़ छीना जा रहा है, एक वैसी व्यवस्था के नाम पर जो कि सामाजिक सद्भाव और बराबरी की सोच के साथ एक निश्चित समय के लिए लाई गई थी, और वोटबैंक की राजनीति तक सिमट गई है, वो कैसे सामने वाले से घृणा या द्वेष नहीं रखेगा? ये मानवीय प्रकृति है। गलत होता देख कोई चुप क्यों रहे? 

और किस तर्क के आधार पर? ‘आपके बाप-दादाओं ने इनके साथ बुरा व्यवहार किया था’ के तर्क पर चलते रहें? एक बेकार व्यवस्था को ज़रूरत बना दें? फिर तो हमें मुसलमानों को खदेड़कर भगा देना चाहिए क्योंकि उन्होंने चार हज़ार मंदिर तोड़े, हिन्दुओं को घर जलाए, महाविद्यालयों में आग लगाए… उनके भी तो पोते-परपोते ज़िंदा होंगे? उनसे भी बदला लिया जाना चाहिए? उनकी आमदनी का एक हिस्सा सरकारों को लेते रहना चाहिए ताकि तमाम मंदिरों का जीर्णोद्धार हो सके और उन परिवारों को शांति मिले जिनके पूर्वजों को बेरहमी से मार-काट दिया था। 

क्या ये तर्क सही है? नहीं, बिलकुल नहीं। दो जगह दो तरह की बातें नहीं हो सकतीं। आर्थिक रूप से सक्षम बनाना ही बराबरी लाएगा, उसके अलावा नौकरी में आरक्षण से लेकर तमाम तरह के आरक्षण इस पूरी आबादी को बेहतरी के लिए प्रयास करने से भी रोकेगा। जब उन्हें पता है कि राजस्थान में शून्य नंबर लाकर भी वो गणित के शिक्षक बन जाएँगे और उन्हें भारत का कोई कानून बच्चों को गणित पढ़ाने से नहीं रोक सकता तो फिर वो मेहनत क्यों करेगा? 

स्कूली शिक्षा इनके लिए हर स्तर पर मुफ़्त होनी चाहिए, और वहाँ आरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन उसके बाद कहीं भी आरक्षण देना उनके मन में ये बैठाना है कि तुम कम भी रहोगे, कुछ नहीं भी करोगे, फिर भी नौकरी मिलने के मौक़े बहुत ज़्यादा हैं। शिक्षा के अवसर मिलने के बाद उन्हें प्रतियोगिता में उसी स्तर पर मुक़ाबला करना चाहिए ताकि उनके मन से ये हीन भावना निकल जाए कि वो किसी से कम हैं। 

आर्थिक मदद देकर सरकारी योजनाओं का लाभ इन्हें मिलना चाहिए जिसमें एक घर की व्यवस्था, किसी एक सदस्य को रोजगार, सस्ते दरों पर अनाज आदि उपलब्ध हो। सर उठाकर जीने के लिए आवश्यक चीज़ें मुहैया होनी चाहिए सरकार की तरफ से लेकिन उनके बच्चों के दिमाग में ये कभी नहीं आना चाहिए कि उनकी नौकरी तो रखी हुई है। जिसके सामने बिना कुछ किए उसका लक्ष्य दिख जाए, वो मेहनत क्यों करेगा? 

वापस कोर्ट के फ़ैसले और न्याय के बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं। न्याय व्यवस्था कुछ मानदंडों पर चलती है जिसमें से एक यह है कि हजार गुनहगार छूट जाएँ लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। एक कानून आया जिसमें पिछड़ी जातियों के लोगों द्वारा शिकायत दर्ज कराने पर सीधे जेल ही जाना है, जाँच बाद में होगी। ज़ाहिर है इसका बहुत ग़लत इस्तेमाल भी हुआ, और ग़लत इस्तेमाल करवाया भी गया। जैसा कि जेएनयू में वामपंथी चिरकुट विपक्षी पार्टियों के छात्र नेताओं पर मोलेस्टेशन के केस करवाते हैं, या धमकी देते हैं कि करवा देंगे। 

दहेज कानून का भी इसी तरह से दुरुपयोग होता रहा। तो सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसला दिया कि एक सप्ताह के भीतर पुलिस शिकायतकर्ता की बात पर जाँच करे और तभी आरोपी को जेल में रखे। ये एक तार्किक बात है। अब इसे कुछ लोगों ने, जो किसी व्यक्ति या पार्टी से घृणा करते हैं, ऐसे दिखाया मानो इन जातियों का हक़ मारा जा रहा है! 

मतलब ये कि ये जिस पर उँगली रख दें वो जेल चला जाए! और मैं बेगुनाह हुआ तो मेरे समय, मानसिक और शारीरिक परेशानी की क्षतिपूर्ति कौन करेगा? क्या शिकायतकर्ता को जेल में डाला जाएगा? क्या न्याय व्यवस्था और संविधान में एक पिछड़ी जाति का व्यक्ति ऊँची जाति के व्यक्ति से ऊँचा है, या फिर उसे भी वही नागरिक अधिकार दिए गए हैं? 

आंदोलन इस बात पर होना था कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में इस कानून से छेड़छाड़ के विरोध में जाना चाहिए। आंदोलनकर्मियों की भीड़ जुटाने के लिए कुछ भी संदेश दे दिया गया कि आरक्षण हटाया जा रहा है। ऐसी बात पर सब सड़कों पर निकल आए और एक ‘दलित’ भीड़ ने दिखा दिया कि वो ‘दलन’ कैसे करती है। रेलों को रोकने से लेकर बसों को तोड़ने, सरकारी और निजी वाहनों में आग लगाते हुए ‘दलितों’ ने ये दिखाया कि उनको सताया जा रहा है, वो लाचार हैं और अकेले मध्य प्रदेश में चार लोगों को मार दिया।

ये किस तरह का विरोधाभास है? क्या इस तंत्र में किसी भी संस्था पर कोई भी भीड़ और आगज़नी के नाम पर दबाव बनाएगा? इसमें दलितों की अस्मिता कहाँ से आ गई? 

अब चिरकुटों का प्रश्न होगा कि क्या विरोध प्रदर्शन असंवैधानिक है? मैंने ये कहीं नहीं कहा। हाँ, मैंने इस हिंसक भीड़ का विरोध किया है। मैंने ये कहा है कि इन्हें ये भी नहीं पता कि प्रदर्शन की भीड़ में ये क्यों हैं। इन्हें यहाँ तक नहीं मालूम कि मुद्दा क्या है। 

इन लोगों को बस इस्तेमाल किया जाता रहा है क्योंकि किसी को नेता बनना है। ऐसी हिंसक भीड़ों से जन्मे नेता आगे चलकर उस भीड़ को भूल जाते हैं। जब तक काम निकलता है लोग लाठी लेकर आपके नाम की माला जपते हुए पहुँच जाते हैं। यही होता रहा है, यही होता रहेगा। आज आप किसी की भीड़ में झंडा और मशाल लेकर आग लगा रहे हैं, कल आपका बेटा नारे लगाएगा। आप रहेंगे हमेशा किसी के लिए नारे लगाने में ही व्यस्त क्योंकि हर ऐसे नाजायज़ नेताओं को एक ज़ायज भीड़ चाहिए। 

इन्हीं जातियों में जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाती है, वो अपनी ही जाति से ऊपर हो जाता है। वो अपने स्तर का भेदभाव करने लगता है। ये भी खूब होता है, अपने आस-पास देखिए तो दिख जाएगा। आर्थिक रूप से इन्हें सहारा मिलना चाहिए, न कि इनके दिमाग में ऊँची जातियों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरना चाहिए जो कि आजकल खूब हो रहा है। 

अंततः एक और ब्रीड है जिसकी बात इसी कड़ी में करना चाहूँगा: वो ब्रीड हैं छद्मबुद्धिजीवियों की जो ऐसे हर मौतें पर प्रोफाइल पिक्चर बदलकर मोदी या भाजपा-विरोधी आंदोलन को अपने एसी कमरे में बैठकर हवा देते हैं। दलितों के अधिकारों से इनका कोई लेना-देना नहीं है। ये सिर्फ फेसबुक पर आदर्शवादी बनते हैं और निजी जीवन में गिरे हुए लोग हैं जो कि हर उस आदर्श से समझौता कर चुके हैं जिसकी बात ये करते नज़र आते हैं। इनके घरों के नौकर निचली जातियों के होंगे जिन्हें या कम पैसे पर रखते होंगे, गालियाँ देते होंगे। इनके बापों के सामने निचली जातियों के लोग ज़मीन पर बैठते होंगे और ये यहाँ पर आंदोलन चला रहे हैं। 

ये भी समाज के नकारे लोग हैं जिन्हें अचानक से लालू जैसा घोटालेबाज़ मसीहाई की तासीर पहुँचाता दिखने लगता है। ये वो गिरे हुए लोग हैं जिनका अंधविरोध दूसरों की अंधभक्ति से भी कई गुणा ज़्यादा है क्योंकि इनको लगता है कि देश में काम तो वही सरकार करेगी जिनको ये वोट देंगे। ये मानसिक रूप से दिवालिया लोग हैं, जिनके लिए हर तरह का आंदोलन ज़ायज है क्योंकि वो भाजपा सरकारों के विरोध में है। ये वही दोगले हैं जिन्हें बिहार का नियंत्रित दंगा दिखता है, लेकिन बंगाल के बारे में पता नहीं चल पाता। 

ख़ैर, किसी का विरोध या समर्थन हर बात के लिए नहीं होता। हम सब ये बात जानते हैं कि हर सरकार कुछ काम ठीक करती है, कुछ काम में उसका ध्यान उतना नहीं होता जितना हमें लगता है कि होना चाहिए, और कुछ सरकार हमारे पैसे से अपने घर और कम्पनियाँ बना लेती हैं। चूँकि आप जिस सड़क पर चल रहे हैं उसमें गड्ढा है इसका मतलब ये नहीं है कि सरकार ने सड़के बनवाई ही नहीं। अगर आप ऐसा कहते हैं, और मानते हैं तो बग़ल के मानसिक अस्पताल में दिखाइए, आपको तुरंत इंटेलेक्चुअल बनने वाला स्टैरॉइड दे दिया गया है जिसकी बोतल के लेवल पर इन्ग्रैडिएंट में ‘मोदी-विरोध 100%’ लिखा हुआ है। 

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