‘टाइम्स अप’: दोस्ती, सेक्सटिंग, सेक्स, सेक्सुअल फ़ेवर्स और विक्टिमहुड

The दिल्ली की पोएट्री सर्किट में एक बवाल आया हुआ है। १४ पुरुष कवियों के स्क्रीनशॉट और उनके कथित तौर पर ‘व्यभिचारी’ होने के ‘सबूत’ बहुत मशक़्क़त के बाद एक ब्लॉग पर चिपका दिए गए हैं।

बात ये है कि बेचारे पुरुष हैं, तो चरित्रहीन तो पहले ही हो गए। मुझे ‘मी टू’ और ‘टाइम्स अप’ कैम्पेन वालों से एक ही बुनियादी मतभेद है कि सारी लड़कियों को सीधी इम्यूनिटी देकर, विक्टिम मानकर बात आगे बढ़ा दी गई। इसमें ये मानना भी ज़रूरी है कि कुछ लोग अपने बॉडी का उपयोग ‘फेवर्स’ के लिए करते होंगे।

ये आम बात है, जो कि मैंने अपने करियर में देखा है कि कई लड़कियाँ अपने तरीक़े से, और लड़के अपने तरीक़े से, बॉस की चाटते रहते हैं। उन्हें लगता है कि प्रमोशन का, इन्क्रीमेंट पाने का ये एक शॉर्टकट है। और वो सफल भी होते हैं।

वैसे ही ‘मी टू’ वाले में, शक्तिहीन लड़कियाँ नहीं हैं सारी। वहाँ वैसी भी लड़कियाँ हैं जिन्होंने सेक्सुअल फ़ेवर को एक ट्रांजेक्शन की तरह इस्तेमाल किया अपने करियर में आगे बढ़ने के लिए। क्योंकि आपको सीधे रास्ते से सफलता नहीं मिल रही थी, तो आपने अपने होश में, ये तय किया कि फ़लाँ प्रोड्यूसर के साथ सोने से आपको वो हासिल हो सकता है।

कुछ घटनाएँ ऐसी पढ़ीं हैं जिसमें मर्दों ने ज़बरदस्ती भी किया है। उनसे मुझे कोई समस्या नहीं है। ये एक अपराध है, और उसके विरोध में बोलना चाहिए। लेकिन इसकी आड़ में वो तमाम रिश्ते ग़ैरक़ानूनी और ‘बलात्कार’ जैसे नहीं कहे जा सकते जहाँ सेक्सुअल फ़ेवर ‘देना’ एक ट्रान्जेक्शन की तरह इस्तेमाल हुआ था।

पोएट्री सर्किट को मैं बेकार मानता रहा हूँ और कभी जाता नहीं। वहाँ की कविताएँ यूट्यूब पर डीके ने ज़बरदस्ती सुनवाई हैं, लगभग अस्सी प्रतिशत वाहियात होती हैं जिसमें सिगरेट, शराब और नॉस्टैल्जिया के अलावा कुछ नहीं होता। ये बात भी है कि कुछ लोग कविता सिर्फ ‘नोटिस’ होने के लिए पढ़ने जाते हैं। सामने वाले की समझ भी उसी स्तर की होती है तो सड़ी हुई कविता पढ़ने वाला ‘कवि’ रिलेशनशिप भी ढूँढने लगता है।

आज जो चौदह नाम आए हैं, मैं उनमें से किसी को भी नहीं जानता। मैंने कई स्क्रीनशॉट्स पढ़े। लिखने वाले ने कहा है कि उन्होंने बहुत मेहनत की इसे जुटाने में, बहुत हिम्मत की ज़रूरत पड़ी। हलाँकि इन सब में लड़कियों की तरफ के स्क्रीनशॉट्स तो हैं, लड़कों के गायब हैं। शायद इतनी मेहनत की ज़रूरत नहीं पड़ी होगी।

वाहियात कवियों की एक और बात है, जो कि इस पूरे प्रकरण का हिस्सा होती है, कि वो शराब और गाँजा पीते हैं। ये पीना आजकल ‘हैप’ माना जाता है, और कविता करने के लिए ज़रूरी भी। इसके कारण ऐसे वाक़ये भी सामने आते हैं जहाँ लड़की ये कहकर निकल लेती है कि उसके साथ ‘नशे में’ ये कर दिया गया।

मेरा सीधा सवाल ये है कि क्या आप भजन संध्या में गई थीं जहाँ गाँजा की गंध आपको अगरबत्ती जैसी लग रही थी? क्या आपको पता नहीं सेक्सुअल प्रीडेटर्स हर जगह घूम रहे हैं, और नशा करना इसमें खुद को उतारने जैसा है? आप ‘मैं उसे दोस्त समझकर वहाँ चली गई’ कहकर मत बचिए। दोस्त समझकर जाती हैं, तो वहाँ आपको अपनी सुरक्षा का अहसास होना चाहिए।

आप आज के सड़े हुए समय में लड़कों की पार्टी में जाती हैं, आप किसी को बताती नहीं, और फिर वहाँ कुछ होता है तो पूरी ज़िम्मेदारी सिर्फ लड़के की नहीं है। नशे में आपका होश खो जाता है कि आप उसे अपने ऊपर ‘ड्राय हम्प’ से लेकर ‘सेक्स’ करने तक का मौक़ा दे देती हैं, तो फिर वो भी तो यही कह सकता है कि ‘नशे में पता नहीं चला’! ऐसा किसी शोध में पता नहीं चला है कि नशे में लड़के और लड़कियों के होश खोने के क्लेम में लड़की सही है, लड़का गलत।

मैं ये नहीं मानता कि लड़के ऐसा नहीं करते। मैं ये बहुत विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि लड़कियों को ऐसे ही ट्रैप किया जाता है। दोस्ती बढ़ाने के बहाने बलात्कार भी होते हैं। इसके लिए कानून हैं, हर किलोमीटर पर पुलिस थाने हैं, महिला हेल्पलाइन है। आपको उसी वक़्त कम्प्लेन करने से किसने रोका है? क्या आपको लगता है कि आपके उठाए गए सवालों का जवाब अब, तीन साल बाद, किसी भी हालत में दिया जा सकता है?

क्या ये साबित हो सकता है कि फ़लाँ लड़की के साथ में दिसम्बर 2015 की रात सेक्स किया था, और वो उसकी सहमति के बग़ैर था? आप ऐसा लिखकर लड़के का चरित्र बर्बाद कर रही हैं, और विक्टिम बन रही हैं। एक अशक्त लड़की, जिसे कानून का ज्ञान न हो, जो मानसिक रूप से अपने निर्णय लेने में सक्षम न हो, जो ऐसी जगह पर हो जहाँ इन बातों को दबा दिया जाता है, जहाँ उसके पास कम्यूनिकेशन आदि के साधन नहीं है, वो अगर दस-बीस-पचास साल बाद भी बोल रही है तो समझ में आता है कि वो उस वक़्त ऐसी स्थिति में नहीं थी।

उसी कड़ी में, सेक्सटिंग के स्क्रीनशॉट लगाने वालों से एक आग्रह ये है कि अगर आपने कुछ समय तक ऐसा किया है, तो फिर इसमें दोनों की ग़लती है, या दोनों की ग़लती नहीं है। आप एक तरफ से ‘फेवरेवल’ जवाब भी दे रही हैं, और दूसरी तरफ सात महीने बाद कह रही हैं कि ‘मुझे तो वो गंदे मैसेज भेजता है’, तो नहीं चलेगा। हाँ, आपने पहली बार कुछ किया, और फिर बाद में ये सीधे तौर पर कह दिया कि ‘मुझे ये अब नहीं करना’।

अगर सामने वाला फिर भी पिछली बातों के आधार पर गंदे मैसेज भेजता है तो वो दोषी है। लेकिन, इसे भी आप तभी क़ानूनी सहायता लेकर तात्कालिक तौर पर ही निपटा दें। मैं जानता हूँ कि आपको लगता होगा कि दोस्त है, पुलिस में जाना गलत होगा, उसका करियर चौपट हो सकता है। लेकिन आपकी इज़्ज़त के सामने किसी का करियर भारी नहीं है।

आप उसको बता दें कि अगले मैसेज को आप फ़ॉरवर्ड कर देंगी पुलिस को, या उसका नंबर दे देंगी। सुधरने वाला, दोस्ती का लिहाज़ करते हुए, इतनें में सुधर जाएगा। एक बात और ध्यान में रखें कि सेक्सटिंग करना गलत नहीं है, लेकिन एक बार करने के बाद आप किसी के साथ ‘सिर्फ़ दोस्त’ बनकर रहने की सोच रही हैं तो ये तर्कसंगत नहीं है। सब ख़त्म कीजिए और दूर रहिए ऐसे लोगों से।

आदर्श स्थिति एक तरफ लेकिन इस तरह के मामलों में जहाँ घर की पार्टी में आए लोगों के साथ कथित तौर पर एक तरह से बलात्कार हो जाता है, और सुबह आपको लगता है कि नशे में ये सब हो गया, जबकि सेक्स के वक़्त आप जगी हुई थीं, तो इसकी आधी ज़िम्मेदारी आपकी है। लड़का ही दोषी नहीं है। आपके विश्वास को उसने तोड़ा, क्योंकि आपने उसे तोड़ने दिया। साथ ही, अगर आप उसी सुबह पुलिस के पास जाती हैं, तो कानून को इतना समय मिलता है कि वो तब के तथ्यों के आधार पर आपको न्याय दिलाए।

जब आप खुद ही आधी गलत हैं, तो आपके मन का चोर तीन साल बाद जो भी करेगा, उसका पूरा ठीकरा किसी लड़के के ऊपर फोड़ना आपकी मंशा पर सवाल उठाता है। कोई भी पढ़ी-लिखी लड़की, इस तरह के मामलों में, इतने समय बीतने के बाद अगर किसी के चरित्र पर सवाल उठाती है, तो आधा गुनाह उसके हिस्से भी है। चूँकि हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार बहुत ही आम है, और लड़कों पर सवाल उठते ही वो दोषी मान लिए जाते हैं, तो इतना समय लेना गलत है।

जो लड़कियाँ कविता लिखती हैं, तरह-तरह का नशा करती हैं (जो कि कई मामलों में ग़ैरक़ानूनी है), वयस्क हैं, सोच-समझ सकती हैं, वो किसी भी ऐसी घटना के होने के बाद, वो भी आज के समय में जहाँ लड़कियों के लिए तमाम हेल्पलाइन आदि उपलब्ध हैं, आपको ये बोलने के लिए इकट्ठा होना पड़ता है कि आपके साथ गलत हुआ?

मैं ‘मी टू’ और ‘टाइम्स अप’ के दौर में सिर्फ उन महिलाओं के साथ हूँ जो अक्षम थीं, जिनके पास क़ानूनी सहायता का कोई विकल्प न था, जिन्हें क़ैद करके रखा गया, जिनके साथ ज़बरदस्ती हुई और पुलिस या समाज ने उन्हें चुप कर दिया। जो लड़कियाँ सक्षम हैं, जिनके घर के पास पुलिस स्टेशन हैं, जो पढ़ और लिख सकती हैं, जिनका एक सपोर्ट सिस्टम है, वो तीन साल बाद ये कहते नज़र आएँ कि फ़लाँ रात को ‘मेरी छाती पर उसने गलत तरीक़े से हाथ चलाया था’ तो मुझे मंशा पर संदेह होता है।

अब मेरे इस लेख पर जो झंडू टाइप के सवाल उठेंगे उनका भी जवाब पहले ही दे देता हूँ: 

1. क्या लड़कियों का नशा करना गलत है? जी हाँ, नशा करना गलत है, और ग़ैरक़ानूनी भी, और वो लड़का-लड़की सब पर लागू होता है। अगर मैं एक नैतिक स्टैंड न भी लूँ, तो भी चूँकि इस प्रकरण में ‘नशा’ को एक माध्यम बनकर आ रहा है, तो उसको इग्नोर करना बेकार है।

2. क्या लड़कियों को कविताएँ नहीं पढ़नी चाहिए? अगर आपको लगता है कि मेरे लेख का निचोड़ ये है, तो आप अपने आप को माफ कीजिए अपनी मूर्खता के लिए।

3. क्या लड़के कुछ भी करें, लड़कियाँ चुप रहें? जी नहीं, लड़के जब भी, जो भी करें, आप कानून की मदद लीजिए। चूँकि इन मामलों में चरित्र हनन लगभग इन्सटैंटली हो जाता है, तो दो साल बाद विक्टिम बनने से बेहतर है कि आप अपने सारे विकल्प उसी वक़्त तलाश लें।

4. दोस्ती के बहाने लड़के फ़ायदा क्यों उठाते हैं? क्योंकि लड़कों को फ़ायदा उठाने दिया जाता है। आपको आज के दौर में ऐसे चालाक लड़कों की चालाकियों से खुद को बचाना चाहिए। जब आप उसको ट्रस्ट करती हैं, और चैट करती हैं, घर पर बुलाती और जाती हैं, तो फिर ऐसे उपाय कर लिया करें कि बाद में स्क्रीनशॉट लगाने की ज़रूरत न पड़े। दोस्तों को बता दें, परिवार को बता दें, या फिर ‘होश’ में रहें। आपको कोई नशा करा रहा हो, तो न करें। क्योंकि वो एक रास्ता है, बहाना है आपके साथ आपकी एक्सप्लिसिट अनुमति के बग़ैर कुछ भी करने की।

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