फ़ेसबुक पर सोए साहित्यकारों के नाम

फ़ेसबुक पर जो लेखक लोग हैं उनसे मुझे एक शिकायत है। आपलोग जब ख़ुद को इस पीढ़ी के साहित्य को आगे ले जाने की बातें करते नज़र आते हैं तो क्या कभी ये भी सोचते हैं कि सोशल मीडिया सिर्फ किताबें बेचने के लिए नहीं बना है?

क्या आप ये सोचते हैं कि शायरी शेयर करके या फिर अपनी किताबों के अंश छोड़कर, और फिर कमेंट में ‘वाह’, ‘ऑस्स्म’, ‘वैरी डीप इनडीड’ आदि के जवाब में ‘शुक्रिया’ लिखने के अलावा भी समाज आपसे और भी उम्मीदें रखता है?

क्या आपको ये नहीं लगता कि साहित्य सिर्फ चार अच्छी और प्रेम की चाशनी में घुली वार्तालापों के अंश से कहीं ज्यादा है? क्या आपको नहीं लगता कि आपका साहित्य को लेकर समाज के प्रति कुछ और भी उत्तरदायित्व है?

आपने कितनी बार और कहाँ किसी सामाजिक समस्या पर बात की है? क्या आप सक्षम नहीं हैं या फिर आपको ये डर है कि आपके कुछ पाठक आपके विचारों से असहमत होकर बिछड़ जाएँगे?

ये दुर्भाग्य है इस दौर का कि आपको सामाजिक समस्याओं पर दो लाइन लिखने का वक्त नहीं मिल रहा और आप ख़ुद को बेस्टसेलर मानकर पेपर का मुकुट लगाए दौड़ रहे हैं।

वो दौर गया कि आप पत्रिकाओं में अपने विचार रखते, कहीं संपादक होते। आज आपकी पत्रिका सोशल मीडिया ही है। और ये समाज, आज की पीढ़ी आप के विचार जानना चाहती है। आपको कैसे दंगों से फ़र्क़ नहीं पड़ता? आपको देश में गिरते स्वास्थ्य व्यवस्था से कैसे फ़र्क़ नहीं पड़ता? आपको बलात्कार और मोलेस्टेशन की ख़बरों से फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ता?

अगर आपको लगता है कि ये आप लिख नहीं सकते तो आप फ़र्ज़ी के लेखक हैं और आप किसी लायक नहीं है। चुल्लू भर पानी लीजिए और डूब मरिए। आप साहित्यिक धारा के नपुंसक हैं। मैं आपको इस तरफ या उस तरफ खड़े होने नहीं कह रहा, मैं आपको बस खड़े होने को कह रहा हूँ।

अगर आप कल्पनाशील हो सकते हैं तो आप इन बातों पर सोच भी सकते हैं। साहित्यकार का एक काम समाज को दिशा देना भी होता है। आप वहाँ पूर्णरूप से असफल हैं। पहले का हर लेखक एक पत्रकार भी था। पत्रकार होने से मेरा मतलब है कि वो समस्याओं पर अपने विचार रखता था।

आज पत्रकार लेखक हो गया है और सामाजिक सरोकार खो रहा है। बस लिख रहा है क्योंकि उसकी हजार-दो हजार किताबें बिक जाएँगी। उसके बाद क्या? किताबें बिकने के बाद क्या? नई किताब?

समाज को किताब के साथ साथ विचारों की भी जरूरत है। भगोड़े मत बनिए। आप में वो क्षमता है कि आप चार लोगों को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। अपने आप को किताबों में मत बाँधिए। तटस्थता हर जगह ठीक नहीं होती। कई मामले हैं जहाँ पर एक ही पक्ष है, वो है सही पक्ष। वहाँ पर आपके बोलने की आशा है। आपके पास सिगरेट और शराब को रोमेंटिसाइज करके लिखने का समय है, लेकिन बलात्कार और अशिक्षा पर नहीं।

ये आपसे नहीं हो रहा है तो फिर फ़ेसबुक पर ज्ञान बाँटना बंद कीजिए। इस मीडिया को समझिए और सेल्फी, प्रशंसा और आत्मुग्धता से ऊपर उठकर देश और समाज में हो रही बातों पर विचार रखिए। पूरे समाज की चर्चा का स्तर ऊपर उठाईए। आपको भी लाभ होगा, समाज को भी।….

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