प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचनेवाले गिरोह और उनके साथियों के नाम

 

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नमस्कार 

मैं अंतर्यामी, त्रिकालज्ञ, भविष्यद्रष्टा पत्रकार!

आज दिन में पकड़े गए तथाकथित वामपंथी ‘एक्टिविस्टों’ को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ रवीश कुमार की रामचंद्र गुहा वाली बेंच ने, जिसमें जस्टिस अरुँधति रॉय समेत जाने-माने ट्विटर न्यायाधीश शामिल थे, कहा है कि आज जितने नक्सली गिरफ़्तार हुए हैं, निर्दोष हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ऑफ रवीश कुमार का फ़ैसला इतना त्वरित होता है कि आधे घंटे में वो जेब में रखे कंचों में से फ़ेवरेट हरे कंचे को ताड़कर बता देते हैं कि गौरी लंकेश की हत्या किसने की थी। हलाँकि, ये बात और है कि बाकी आम लोग जब ऐसे ही दो मिनट में फेसबुक पर किसी को आतंकी, नक्सली, हिंसक, या नौटंकीबाज़ कहते हैं तो ट्विटर के ट्वीटों से वकालत सीखने वाले सुप्रीम कोर्ट ऑफ रवीश कुमार के मुख्य न्यायमूर्ति रवीश कुमार जी ये पूछने लगते हैं कि ये लोग कौन हैं जो फ़ैसला सुना रहे हैं। 

माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ रवीश कुमार की ऐसी अदालतें जब भी रात के नौ बजे लगती हैं, तो उनमें ऑर्डर-ऑर्डर की जगह ये ‘डर का माहौल-डर का माहौल’ करते हुए, ‘दलित-दलित’ करने लगते हैं। दलीलों में सबसे आगे यह होता है कि सरकार प्रश्न पूछने वालों को जेल में डाल रही है, जबकि रवीश कुमार स्वयं सबसे ज़्यादा प्रश्न पूछकर ये बताने के लिए बचे रह जाते हैं कि प्रश्न पूछने वाले जेल में डाल दिए जाते हैं। 

क्या प्रधानमंत्री को राजीव गाँधी स्टाइल में मारने की बात लिखनेवाले लोग ‘प्रश्न’ पूछ रहे हैं? अगर ऐसी प्लानिंग को प्रश्न पूछना कहते हैं तो न्यायाधीश रवीश कुमार बिलकुल सही हैं। इंदिरा गाँधी के दोनों बॉडीगार्ड भी प्रश्न पूछते हुए प्रैक्टिकल एक्जाम देने लगे एक दिन और देश की सशक्त प्रधानमंत्री की हत्या हो गई। उसके बाद हमें ललबबुआ राजीव गाँधी मिले जिन्होंने सौ पैसे में पंद्रह पहुँचाकर कॉन्ग्रेस के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे को जीवित रखा।

फिर एक और प्रश्न पूछा गया और रैली में पब्लिकली पूछ लिया गया। दूसरे प्रधानमंत्री की भी हत्या हो गई। आखिर उनकी भी तो कुछ माँग रही होगी, वो भी तो अपने हिसाब से प्लानिंग करते वक्त किसी प्रधानमंत्री को गोलियों से छलनी करने और बम से उड़ा देने को ज़ायज मान रहे होंगे? क्या उन हत्याओं को डिस्सेंट या ऑल्टरनेटिव ओपिनियन कहा जाए? या ये कहकर बच लिया जाए कि उस समय ट्विटर नहीं था तो ‘कई लोगों के ट्वीट’ से ये साबित नहीं किया जा सकता की हत्या सही थी या गलत?

ये कौन लोग हैं? मॉब लिंचिंग करने वालों पकड़े गए कि नहीं का सवाल करने वाले मुँह ये क्यों नहीं पूछ पाते सुकमा, गढ़चिरौली और दाँतेवाड़ा आदि में जो नरसंहार हुए उनके गुनहगार कहाँ हैं? मॉब लिंचिंग के गुनहगारों को पकड़ने की बात करने वाले रवीश को शायद ये डेटा ट्विटर से नहीं मिला होगा कि जहाँ-जहाँ ये वारदातें हुई हैं, हर जगह एफआईआर दर्ज हुई है और जाँच हो रही है। 

पुलिस विभाग की समस्या यह है कि थाने में हरे कंचे देखकर ‘ये-ये-और ये’ कहने वाला रवीश कुमार नहीं है जो आधे घंटे के अंदर अंतरात्मा की आवाज और दिमाग में बैठे संजय को टेलिपैथी से डायल करके भूत-भविष्य जान जाता है और माइक लेकर, बग़लों से पसीना बहाते हुए, सीरियस चेहरा बनाकर प्रेस क्लब में ‘डर का माहौल’ पर भाषण देने पहुँच जाता है। जबकि, उसी साल लंकेश की हत्या से पहले बाईस और पत्रकारों की हत्या पर न तो एक ट्वीट कर पाता है, न ही एक पोस्ट लिख पाता है उसी गम्भीरता से। 

ये जो पकड़े गए हैं, वो कौन हैं, क्या हैं, कैसे लोग हैं, ये कौन तय करेगा? क्या पुलिस को पहले समाज के स्वघोषित ठेकेदारों और पत्रकारिता को पंचशील फ्लायओवर पर खड़े होकर आती जाती, रुकती कारों की गिरती खिड़कियों से आती ‘आई लाइक इट, हाउ मच’ सुनकर अपना दाम बताने वाले धंधेबाज़ों जैसा बनाने वाले लोगों से पूछना चाहिए कि उन्हें ये कम्प्यूटर, हार्ड डिस्क और पेपर मिले हैं, अब वो क्या करें? 

प्रधानमंत्री की हत्या की विस्तृत स्तर पर योजना बनाई जा रही है और इनको लगता है कि जिनके पास से ये मैटेरियल मिला है वो दलित चिंतक और मानवाधिकारों के हिमायती हैं? ये दलित चिंतक हैं या फिर समाज में दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई में घी डालने वाले लोग! ये मानवाधिकारों के हिमायती हैं या फिर आतंकियों और उनके परिवारों के बारे में ये बताने वाले कि मसूद अज़हर दिल का बड़ा नेक इन्सान था और फलाने आतंकी के बेटे का नाम ग़ालिब है जो प्रथम श्रेणी से दसवीं पास कर गया? 

ये नक्सली और आतंकी विचारधारा के पोषक समाज को देश की परिभाषा बताएँगे और ये बताएँगे हमें कि लोकतंत्र क्या है? लोकतंत्र है इसलिए पुलिस तुमसे पूछताछ करती है। वरना जिस माओ का नाम जपते हो, और सपना देखते हो कि तुम्हारे सीढीनुमा डीएनए में किसी तरह माओ और लेनिन के नाम की एक लकड़ी अटक जाए, उनके देशों में पता करो कि ऐसे लोगों का क्या होता है।

एक ब्लॉग लिखने पर तुम कहाँ गायब कर दिए जाओगे पता भी नहीं चलेगा। ख़ैर, उसके लिए चीन या रूस भी क्यों, बंगाल और केरल भी तो जाया जा ही सकता है जहाँ सत्ता के खिलाफ बात करने वालों को सरेआम काटकर नमक की बोरियों के साथ दफ़ना दिया जाता है कि लाश का एक टुकड़ा भी न मिले। इसलिए लोकतंत्र कैसे काम करता है इसकी क्लास नक्सली और माओवादी दोगले न लें तो बेहतर है।

वैसे भी, एक ऐसी विचारधारा के जने आतंकियों से और क्या अपेक्षा की जा सकती है जिन्होंने राजनैतिक हिंसा को मेनस्ट्रीम ही नहीं किया बल्कि ये नरसंहार क्यों ज़ायज हैं इन पर बाक़ायदा सेमिनार से लेकर पुस्तकें छपवाते रहे हैं। इन्होंने पोलिटिकल किलिंग्स को जस्टिफाय किया है। इन्हीं की बदौलत, ये विचारधारा लोगों को ये समझाने में सफल हो जाती है कि गरीबी एक तरह की हिंसा है, और उसके लिए अगर आप दस लोगों को भड़काकर किसी आम सरकारी मुलाजिम को गोली मार देते हैं, तो वो सही है। 

दंगों में मरने वालों के ख़ून धोती पार्टियों के पाप फिर भी कम पड़ जाएँगे अगर नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों की लाशें गिनी जाएँ तो। आखिर कौन हवा देता है ऐसी हिंसा को? रवीश कुमार और इनका पूरा गिरोह छाती पर लैपल माइक लगाकर, गम्भीर चेहरा बनाकर ये क्यों नहीं पूछता कि इस हिंसा में मरे हुए लोगों के बेटे का नाम क्या है, और क्या उसका पिता एक अच्छा पिता था, या ये कि उसकी बिटिया ने मैट्रिक में कितने नंबर लाए? 

ऐसे आतंकियों के हिमायतियों को भी आतंकी ही माना जाना चाहिए। ज़रूरत है कि इन लोगों की शिनाख्त हो, और सरकार, चाहे जो भी रहे, इन्हें लगातार निगरानी में रखे। इनकी हरकतों पर निगाह होनी चाहिए क्योंकि ये लोग कब किसी आठ साल के बच्चे की छाती में बम बाँधकर किसी भीड़ में भेज देंगे, ये कोई नहीं जानता।

नमस्कार। 

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