उनके नाम जिन्होंने नारीवाद को पीरियड्स के धब्बों के फोटो तक सीमित कर दिया है

पीरियड्स, या माहवारी, १२ साल की लड़की से लेकर ४५-५० साल तक की महिलाओं को आते हैं। इसका दर्द, इसके कारण झेली जाती असहजता, इससे जुड़ी भ्रांतियाँ हमारे समाज का हिस्सा रही हैं। इसको लेकर बहुत कैम्पेन चले हैं। पैड्स इस्तेमाल करने को लेकर कई ग़ैरसरकारी संस्थानों ने इस पर कार्य किया है ताकि उनके दाम कम हों और उन तक पहुँचे जो इससे वंचित हैं।

गाँवों में ग़रीबी और अनभिज्ञता के कारण लड़कियाँ और महिलाएँ कपड़े, घास, गोबर के साथ-साथ पत्ते और राख तक पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल करते हैं। ज़ाहिर है कि इनसे कई तरह के रोग होते हैं। रोग कैंसर तक का रूप धारण कर लेते हैं। यही कारण है कि इन स्त्रियों की मौत जल्दी होती है, उनका विकास बाधित हो जाता है, और वो बहुत कष्ट में जीवन व्यतीत करती हैं।

पीरियड्स को टैबू माना जाता रहा है। टैबू मतलब ये कि इस पर माँ अपनी बेटी से भी ठीक से बात नहीं करती। इसी बात पर कैम्पेन चले कि इस पर बात होनी ज़रूरी है। ये कैम्पेन सैनिटरी नैपकिन बनाने वाले अरबों के कारोबार करने वाली संस्थाओं से लेकर ग़ैरसरकारी संस्थाओं ने तथा कई महिलाओं ने अपने दम पर चलाया है। इसका उद्देश्य था कि बात करने से इसको लेकर जागरूकता फैलेगी।

कपड़े ही इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें साफ करके सुखाना ज़रूरी है। राख, घास, पत्ते आदि इस्तेमाल ना करें क्योंकि इनसे इन्फैक्शन होने की संभावना होती है। कैम्पेन के ज़रिए ये बताया जाता रहा है कि अपने गुप्तांगों को साफ रखना चाहिए, क्योंकि इस दौरान तमाम तरह की बीमारियों के होने के आसार होते हैं जो जानलेवा साबित हो सकती हैं।

ये लोग ज़मीन पर कुछ काम कर रहे थे। फिर एक हिस्सा हमारे समाज का वो आया जिसके पास हर तरह की सुविधा है लेकिन वो अपनी पहचान तलाशने में व्यस्त है। आईडेंटिटी क्राइसिस से ग्रस्त लोग। ये तबक़ा तुरंत ही कुछ करके कुछ पा जाना चाहता है। इसे प्रसिद्ध होने की भूख है। ये प्रतीकों को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हुए नेता या नेत्री बनने की चाह में होते हैं। ऐसे लोग ज़मीनी हक़ीक़त से बहुत दूर, फेसबुक आदि पर ही कैम्पेन चलाते हैं और उनके लिए वो रास्ता सबसे सही होता है जो सबसे छोटा होता है।

इस कैम्पेन का इस्तेमाल वैसे लोग करने लगे जो नारीवाद की बात कर रहे थे। जबकि नारीवाद बहुत ही व्यापक क्षेत्र हैं, जिसका एक आयाम स्त्री-स्वास्थ्य है क्योंकि उनको मर्दों की अपेक्षा स्वास्थ्य सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं, या वो खुद ही समाजिक कंडिशनिंग के कारण छुपाती हैं। जैसे कि मेरी माँ का दर्द जब चरम पर नहीं पहुँचेगा वो नहीं बताएगी कि कुछ हुआ है। जब तक डॉक्टर के पास पहुँचेंगे, पता चलेगा कि अब बचने की नौबत नहीं है।

इस तरह के लोग कैम्पेन की पवित्रता और लक्ष्य को हाइजैक करके इतना नीचे ले आते हैं कि आम जनता को ये लगने लगता है कि यही मुख्य उद्देश्य है। जैसे कि पीरियड्स के धब्बों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालना। चाहे वो आपके पजामें पर हो, चादर पर हो, या कुर्सी के गद्दों पर, मुझे ये समझ में नहीं आता कि धब्बों को शेयर करने से किस प्रकार की जागरूकता फैल रही है? क्या इसके बाद बहुत सारी लड़कियाँ ऐसा करने लगेंगी? अगर हाँ तो उससे स्त्री-स्वास्थ्य के क्षेत्र में किस तरह का बदलाव आ जाएगा?

मेरे लिए, और मेरे कई महिला मित्रों के लिए, इस तरह के धब्बे देखना एक डिसगस्ट का भाव लाता है। जैसे कि आपको किसी ने विष्ठा (मल, टट्टी) की तस्वीर दिखा दी हो। मल को देखकर क्या मेरे मन में डायरिया (दस्त आदि) के प्रति जागरूकता फैलेगी? क्या किसी को वो देखना ज़रूरी है? अगर सारी लड़कियाँ ऐसा करने लगे, और उनसे लाभ हो तो मुझे इससे आपत्ति नहीं है।

मुझे आपत्ति इस बात से है कि नारीवाद का दायरा, इसका दर्शन, संकुचित और संकीर्ण होकर अब पीरियड्स के धब्बे तक पहुँच गया है। आपको नारीवादी बनने के लिए, नारियों की स्थिति पर बात करने की, जागरूक करने हेतु बातें लिखने की ज़रूरत नहीं। आप सिर्फ वो धब्बा दिखा दें, आपको जनता मान लेगी कि हाँ ये युग प्रवर्तक नारीवादी हैं।

इनका बेस ही हिला हुआ है। इनको पता ही नहीं की समानता की जड़ में स्त्री का आर्थिक रूप से मर्दों पर आश्रित होना है। इनको पता ही नहीं कि जब तक नौकरी में समान टैलेंट के लिए समान पैकेज नहीं मिलता, धब्बों के फोटो लगाने से स्त्रियों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा। इनको जानना चाहिए कि बराबरी की बात समाज को उस स्थिति में ले जाने की कोशिश से है जहाँ एक स्त्री अपने फ़ैसले ले सकती है। ये वो अवस्था होगी जहाँ वो अपनी मर्ज़ी से नौकरी, शादी और बच्चों पर निर्णय करे। अगर वो एक गलत शादी में फँस गई है तो वहाँ से निकल सके क्योंकि उसके पास अपने आप को सँभालने के लिए अपना आर्थिक संबल होगा। क्या वो अपने पति को चादर पर पीरियड्स के धब्बे दिखाकर उस शादी से बाहर आ सकती है? मुझे ऐसा नहीं लगता।

नारीवाद को, महिलाओं की समानता को पीरियड्स के धब्बे तक मत गिराइए। इससे नुक़सान आपका कुछ नहीं क्योंकि आप तो बेहतर परिवार से हैं, नौकरीशुदा हैं, आपके पास एक आवाज़ है, हॉस्पिटल है। इससे आप उन सबका नुक़सान कर रही हैं जो नारीवाद के सच्चे रूप को लेकर प्रयासरत हैं। और हाँ, नारीवादी होने के लिए, पीरियड्स पर बात करने के लिए मुझे एक स्त्री होने की ज़रूरत नहीं है। अगर मैं एक मानव के तौर पर कुछ सोच पा रहा हूँ, जहाँ मेरे लिए स्त्री, पुरुष और तमाम बाकी सेक्सुअल और जेंडर आइडेंटिटीज़ एक हैं, मुझे इस तरह के विकृत प्रश्न का जवाब देने की ज़रूरत नहीं कि ‘डू यू हैव यूटेरस?’….

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