यात्रा वृत्तांत: मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जीवित स्मारक हैं इतिहास के

गुड़गाँव के एक रेस्ट्रो-बार में बैठे हुए जुलाई 2017 में ये प्लान बना कि नए साल को रूस में मनाया जाए। कबीर जी का प्रपोज़ल था, और प्रवीण जी, सचिन, धैर्यकांत तथा मैंने इस पर मुहर लगा दी कि ठीक है। दो लोग निजी कारणों से नहीं जा पाए। मैं, कबीर जी और धैर्यकांत ने टिकट बुक कराया चार महीने पहले। रूस की एरोफ्लोट एयरलाइंस है जिसका दोतरफ़ा किराया कुल 24,000 रुपए प्रति व्यक्ति है। रहने की जगह एयरबीएनबी नामक एप्प के ज़रिए बुक हो गई थी।

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दो महीने बचे थे तो वीज़ा भी करवा लिया जिसका खर्चा शायद 3000 रुपए आया था। 26 दिसंबर की सुबह मैं और धैर्यकांत दिल्ली से मॉस्को के शेरेमेतयेवो एयरपोर्ट के लिए निकल गए। लगभग छः घंटे की फ़्लाइट थी। फ़्लाइट में लोग कम थे तो बीच की ‘फ़ाइव सीटर’ बे में कई लोगों ने सीट के आर्म रेस्ट को ऊपर कर दिया और उस पर स्लीपर का आनंद लेने लगे। मुझे बड़ा अजीब लगा कि ये प्लेन में बस वाला सिस्टम क्यों है! ख़ैर, ये पहला एक्सपीरिएंस था मेरे लिए कि प्लेन में भी लोग इस तरह के काम करते हैं।

एयरपोर्ट पर उतरा तो बर्फ़ गिर रही थी। ठंढी हवा तेज़ रफ़्तार से चल रही थी और मुझे ये भी डर लग रहा था कि लैंड कैसे करेगी प्लेन क्योंकि जमी बर्फ़ पर तो पैर भी फिसलते हैं, कहीं चक्का न फिसल जाए। वहाँ तमाम मशीनें बर्फ़ को हटाने और रनवे को साफ रखने में लगी हुई थीं। पूरा रनवे एकदम साफ, बर्फ़ कहीं नहीं। बाकी हिस्सों पर बर्फ़ की मोटी परत जमी हुई।

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सबसे पहला काम ये किया कि एयरपोर्ट के निकास से पहले एक मोहतरमा से 700 रूबल में 5 जीबी डेटा और अनलिमिटेड कॉल वाला सिम ले लिया। एमटीएस कम्पनी भले ही यहाँ न चली हो, पर रूस में कभी भी डेटा को लेकर निराश नहीं किया। यहाँ तो घरों में वोडाफ़ोन का 4G नहीं चलता, वहाँ 86 मीटर गहरे बंकरों जैसे मेट्रो की सुरंगों में भी एलटीई ने साथ नहीं छोड़ा।

वहाँ से निकले तो बाहर आते ही अपने कमरे पर जाना था। किसी एलेक्ज़ेंडर नाम के व्यक्ति का कमरा था जिसे थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी आती थी। उसने पता भेज दिया और हमने ऊबर से कैब बुला ली। ड्राइवर को अंग्रेज़ी नहीं आती थी, लेकिन बीस मिनट की जद्दोजहद और फोन पर शब्दों को तोड़-तोड़कर बोलने के बाद ड्राइवर मिल गया जो कि हमसे बस बीस मीटर दूर हमें ढूँढ रहा था। बाद में ये सीख मिली कि कैब भीतर अपार्टमेंट या मॉल आदि से बुक न करके, सीधे लोकेशन से करो जो सड़क पर है ताकि ड्राइवर वहाँ आ ही जाए।

पूरे रास्ते में बर्फ़ से सनी सड़क, और उसके दोनों तरफ सफ़ेदी की चादर। सड़क पर तेज़ी से भागती गाड़ियाँ जो कि बर्फ़ को पिघलाकर मिट्टी में मिलाकर एक गंदा पेस्ट बना रही थीं। गाड़ियाँ बहुत कम ऐसी थीं जो साफ थीं। अधिकतर गाड़ियाँ बहुत गंदी, जिसके सिर्फ आगे के शीशे ही साफ़ थे। वजह ये रही होगी कि ऐसे समय में पास की गाड़ियों से उड़ती गंदगी उसे गंदा कर ही देगी, तो साफ करने का क्या फ़ायदा। दूसरी बात ये भी कि इतनी ठंढ में गाड़ी धोएगा भी कौन? सेल्फ़ सर्विस वाली जगहें हैं लेकिन वो महँगी हैं।

तमाम इमारतों, मॉलों और सड़कों के दोनों तरफ की दुकानों को निहारते हुए हम मॉस्को शहर में घुसे। शहर से पहले आपको कई बहुमंज़िली इमारतें दिखेंगी जो डिब्बों की तरह दिखती हैं, एक ही तरह के डिज़ाइन और आर्किटेक्चर वाली। इनमें और बीजिंग की वैसी बिल्डिंगों में काफ़ी समानता दिखी। हो सकता है दोनों ही कम्युनिस्ट देश हैं, तो एक दूसरे से मिलते हों। रिहायशी इमारतें, हाउसिंग सोसाइटीज़ पूरी तरह से घनाभाकार थे, जिसमें कई बिल्डिंगों के बीच पार्क आदि मिल जाते थे।

एक ज़रूरी बात नोट करने योग्य ये है कि पूरे शहर में, या शायद देश में, घर के या व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के भीतर का तापमान बाईस डिग्री रखने का प्रावधान है। चाहे कमरा हो, रेस्तराँ हो, दुकान हो, स्टेशन हो या कि मॉल, हर जगह आपको गर्मी का अहसास होगा, चाहे बाहर सर्दी -3° सेल्सियस क्यों न हो। घर में लोग पर्सनल हीटर भी रखते हैं, जो कि अलग तरह का होता है। ये दिल्ली में मिलने वाले लाल रंग के रॉड वाला नहीं होता। वो होटलों में आपको मिलेगा जो कि चपटे धातुओं की खोखली शीट्स से बना होता है। वो एक कास्ट आइरन रेडिएटर होता है जो सरकारी होती है। सेंट्रल हीटिंग सिस्टम भी होता है जो कि तेल से चलने वाले ब्वॉयलर से चलता है। यहाँ आपको अमेरिका की तर्ज़ पर थर्मोस्टैट का टेंशन नहीं दिखेगा।

हम एलेक्ज़ेंडर के बताए पते पर, बोलश्या पिनेरेस्केआ उलीत्ज़ा, लगभग एक घंटे में पहुँचे। वहाँ स्ट्रीट को उलीत्ज़ा कहते हैं। चौदहवीं मंज़िल पर कमरा था जिसमें किचन, बाथरूम, बालकनी और बेडरूम के साथ ड्राइंगरूम थे। टीवी और इंटरनेट की सुविधा थी। इंटरनेट की स्पीड काफ़ी अच्छी थी। कमरा साफ-सुथरा और बड़ा था। थोड़ी देर तक आराम फ़रमाने के बाद गूगल मैप की मदद से मैं और डीके (धैर्यकांत) भोजन की तलाश में निकल पड़े क्योंकि 25 की रात में जो खाया था, वही बचा था शरीर में। पास ही पावेलेट्सकेआ स्टेशन था, जहाँ तमाम तरह के खाने के विकल्प मौजूद थे।

नए शहर में बिना रिस्क लिए हमलोग केएफसी में घुस गए और गूगल ट्रांसलेट का इस्तेमाल करते हुए बताया कि हमें क्या चाहिए।

गूगल मैप्स और गूगल ट्रांसलेट

ये दोनों ही एप्स जीवनरक्षक हैं जब आप बाहर कहीं जाते हैं तो। आपकी पूरी बात ये भले ही न समझा पाए लेकिन तोड़-तोड़कर आपको आपकी बात कहने में मदद करता है। चाहे किसी से चैट करना हो, किसी से रास्ता पूछना हो, कोई और बात कहनी हो, ट्रांसलेट में टाइप करके उसकी तरफ फोन कर दीजिए, वो हर संभव मदद करेगा। इसके अलावा इशारे तो हैं ही। मॉस्को में अंग्रेज़ी में भी रास्तों और स्टेशनों के नाम हैं तो दिक्कत नहीं होती। ट्रांसलेट एप्प में ‘इन्सटैंट ट्रांसलेशन’ हेतु भारत में ही एक्सट्रा लैंग्वेज पैक डाउनलोड कर लें। इससे फ़ायदा ये होता है कि आप किसी भी तस्वीर पर लिखे शब्द को कैमरे की जद में लाएँगे तो वो उस टेक्स्ट को उसी तस्वीर के ऊपर ही अंग्रेज़ी या आपकी वांछनीय भाषा में अनुवाद कर देगा।

गूगल मैप्स से आप खाने की जगहें, बार, कैब, रास्ता, एटीएम, बैंक, शॉपिंग सेंटर, सुपर स्टोर, बाज़ार आदि खोजकर पैदल या कैब से जा सकते हैं। आप कहीं भी खो नहीं सकते अगर आपका फोन चार्ज है तो। फोन को हमेशा चार्ज रखें, और हो सके तो बैटरी या पावर बैंक साथ रखें। कई लोग ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकत करते हैं, और उसके कारण वो मुश्किल में फँस सकते हैं।

यहाँ पर मैं डीके की बुराई नहीं कर रहा लेकिन ये बताना ज़रूरी है कि अगर आप अकेले हों तो बिग बॉस, क्राइम पेट्रोल जैसे शो को देखने के चक्कर में फोन का डेटा और पावर बर्बाद न करें। इसके कारण डीके एक बार बुरी तरह से फँसा और उसे रोना आ गया। क्योंकि उसका फोन बंद हो गया, और उसे रास्ते का भी ख़्याल नहीं था। किसी तरह पहुँचा घर।

केएफसी से चिकन का बकेट लेकर वहीं खाने बैठ गए। पूरी बाल्टी खा नहीं पाए, तो बचे हुए को पैक करा लिया। वहाँ आपको फ़्री में सिर्फ़ नैपकिन और वेट वाइप ही मिलेगा, सॉस और कैचअप बीस रूबल का अलग से लीजिए। पानी मुफ़्त में टैप वाटर भी नहीं सर्व होता। न ही हाथ धोने के लिए वॉशबेसिन की सुविधा बहुत ज़्यादा जगहों पर दिखी।

पानी 67 रूबल का आधा लीटर देखकर हमने सोचा कि स्टेशन पर महँगा मिलता है। वहाँ पिया ही नहीं। इंटरनेट पर सर्च किया कि क्या मॉस्को का सप्लाय वाटर पीने योग्य है, तो मिली-जुली प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली। फिर ये तय हुआ कि रिस्क न लिया जाय और पानी ख़रीद लिया जाय। वापसी में पैदल चलते हुए आ रहे थे, तो रास्ते में सुपर स्टोर मिला। वहाँ फिर से महँगे पानी की बोतलें देखकर मिज़ाज झन्ना गया। थोड़ा खोजने पर पाँच लीटर की एक बोतल मिल गई जो मात्र 44 रूबल की थी। उस पर बर्फ़ीले पहाड़ का चित्र देखकर समझ गए कि पानी ही है। लेकिन फिर भी, निश्चिंत होने के लिए गूगल ट्रांसलेट एप्प से फोटो स्कैन कर पढ़ लिया कि पानी ही है, सोडा नहीं।

कमरे पर वापस आ गए। कबीर जी रात के दो बजे पहुँचे। अगले दिन प्लान तय हुआ कि क्या करना है। मेरी एक मित्र है, क्सेनिया सेमेनोवा, जो कि मॉस्को से ही है, तो उससे मैंने पहले ही बात कर ली थी कि मेरे पास इतना समय है और ये सारे काम करने हैं। उसने उसी हिसाब से सारी बातें बता दी थीं, जगहों के नाम और कैसे क्या देखना है, सब बता दिया था। अगर आपका कोई फेसबुक मित्र भी हो तो उसके देश में जाने के पहले उससे बातें कर लें कि घूमना कैसे है।

दिल्ली या भारत के लोगों के लिए पाँच सौ मीटर की दूरी के लिए रिक्शा, ऑटो आदि मिल जाते हैं, लेकिन यहाँ कैब या ट्राम लेना पड़ता है। ट्राम का नंबर होता है जो कि आपको गूगल मैप बता देगा। यहाँ मेरी एक पूर्व छात्रा भी मिल गई जिसे मैंने फ़ेसबुक के ज़रिए खोज निकाला। उसने मेरा स्टेटस देखा था कि मैं मॉस्को जा रहा हूँ। लेकिन ‘भेड़िया आया’ वाली बात हो गई क्योंकि मैं हर महीने फ़ेसबुक पर निजी विमान से इस्ताम्बुल आदि जाता रहता हूँ। उसे लगा कि मजाक है, तो उसने कॉन्टैक्ट नहीं किया। मुझे फ़ेसबुक ने सजेशन दिया कि इस शहर में मेरे चार मित्र आ चुके हैं, और वो फ़लाँ जगहें घूम चुके हैं। टेक्नॉलॉजी का एक फ़ायदा ये भी है।

ट्राम या मेट्रो को लिए चारू, मेरी छात्रा, ने बताया कि 2000 रूबल का महीने भर का पास बन जाता है जो कि मेट्रो और ट्राम में अनलिमिटेड दूरी तय करने के लिए बेहतर होता है। एक ट्रिक और है कि मेट्रो में एक आदमी घुस जाए, और सात मिनट बाद आप ही के कार्ड से दूसरा आदमी भी घुस सकता है। हालाँकि हमने महीने भर वाला कार्ड लेना मुनासिब नहीं समझा और इसका लाभ नहीं ले सके। विद्यार्थी लोग यहाँ ऐसा खूब करते हैं।

क्सेनिया ने बता रखा था कि मेरे कमरे के क़रीब जो मेट्रो स्टेशन है वहाँ से मात्र एक स्टेशन की दूरी पर ‘रेड स्क्वैयर’ है। रेड स्क्वैयर के पास ही मॉस्को के अधिकांश महत्वपूर्ण स्मारक, पार्क, संग्रहालय और बाज़ार हैं। उसने बता दिया था कि पैदल ही वहाँ से सेंट बेज़िल्स कैथेड्रल, कैथेड्रल ऑफ़ क्राइस्ट द सेवियर, ज़ारयाडाय पार्क, मॉस्क्वा नदी के पार अरबत स्ट्रीट, क्रैमलिन, लेनिन की समाधि, स्टेट हिस्ट्री म्यूज़ियम, रूसी संसद आदि घूमे जा सकते हैं। हमने वही किया भी। पहले दिन ऐसे ही घूमते रहे।

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दूसरे दिन मॉस्को की बाकी जगहों को देखने के लिए हॉप ऑन हॉप ऑफ़ बस का सहारा लिया जिसने हमें मॉस्को के कई बड़ी इमारतों और महत्पूर्ण जगहों को दिखाया। इमारतों के बारे में बस यही कहना चाहूँगा कि शहर ने उन्हें संजो कर रखा है, नकारा नहीं है। दिल्ली या बिहार में बहुत ऐसी जगहें हैं जो कि भगवान भरोसे खड़ी हैं। उन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। उन्हें पैसा कमाने का ज़रिया बनाने के बारे में नहीं सोचा जाता। नालंदा विश्वविद्यालय के छात्रावासों के खंडहर में आठ-आठ फ़ीट के घास उगे हुए थे जब मैं 2012 में देखने गया था।

वहाँ डेढ़ से दो सौ साल पुरानी इमारतों को उनकी स्थापत्य कला के साथ वैसे ही जीवित रखा गया है। उनके भीतर लोग आते-जाते हैं, देखते हैं, तस्वीरें लेते हैं, और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाता। शहर की इमारतों को देखकर लगता है कि किसी बहुत बड़े संग्रहालय में आ गए हैं जहाँ ये इमारतें अपने आप में कोई अजूबे हैं जिन्हें मिनियेचराइज़ करके देखने के लिए रख दिया गया हो। बड़ी-बड़ी और शानदार इमारतें, महल, सरकारी भवन तथा बीच में बहती मॉस्क्वा नदी मॉस्को की पहचान हैं।

मॉस्को एक ‘रेडियल सिटी’ है। इसका मतलब है कि इसको बनाने वाले ने इसे एक गोल आकार में प्लान किया था। शहर बसाने के पहले के तीन मुख्य उद्देश्य थे कि ये शहर रहने के लिहाज़ से, व्यापार के लिहाज़ से और राजधानी होने के कारण सुरक्षा के लिहाज़ से बेहतरीन हो। और बनाने वाले ने इन तीन बातों का खूब ध्यान रखा है।

सामान्य जीवन और परिवहन

सड़कें आम तौर पर 4+4 लेन की मिलेंगी, शहर के भीतर की सड़कें 3+3 से कम बहुत ही कम जगहों पर हैं। हाइवे तो 6-8 लेन वाले ही हैं। सड़कों पर ट्राम की पटरियाँ भी दिख जाएँगी। यहाँ की ट्राम तेज़ चलती हैं, कोलकाता वाली ट्राम की तरह नहीं जिस पर से आप उतरकर दौड़ लेंगे तो वो पीछे हो जाएगी। ट्राम में भी किराया वसूली वाला गेट होता है जहाँ आप कार्ड सटाते हैं और अंदर बैठते हैं। हमलोग एक दिन चढ़ गए, कंडक्टर दिखा ही नहीं। फिर अगले स्टॉप पर डर के मारे उतर गए। बाद में पता चला कि ड्राइवर ही टिकट देती है। एक कमाल की बात ये भी थी कि लगभग सारे ट्राम को महिलाएँ ही चला रही थीं। वैसे ही, ट्रेन की टिकट चेक करने वाली भी अधिकतर कर्मचारी महिलाएँ ही थीं।

सड़कों के साथ किसी भी एक तरफ या दोनों तरफ पैदल यात्रियों के लिए चौड़े फुटपाथ मिलेंगे। अगर इलाक़ा बाज़ार का है, तो फुटपाथ की चौड़ाई तीन से चार लेन की सड़क जितनी हो सकती है, अन्यथा कम से कम तीन से पाँच आदमी एक पंक्ति में चल सकें इतनी जगह ज़रूर होती है। गाड़ियाँ आपको पैदल चलता देख रुक जाती हैं ताकि आप बेख़ौफ़ सड़क पार कर लें। आप उत्तर भारतीय हैं तो आपको आश्चर्य होगा कि ये आदमी गाली देने की बजाय गाड़ी रोककर हमें पार करने का इशारा क्यों कर रहा है!

लोग ट्रैफ़िक लाइट को सीरियसली लेते हैं और उस पर आँख मूँदकर विश्वास किया जा सकता है। मसलन, अगर लाइट ग्रीन हुई तो दो से पाँच सेकेंड में गाड़ी फ़ुल स्पीड से निकल जाती है क्योंकि उसे पता है कोई भी सिगनल नहीं तोड़ेगा। वैसे ही, अगर आप पैदल यात्री हैं और लाइट आपके लिए ग्रीन हुई है तो आप आँख बंद करके गुनगुनाते हुए सड़क पार कर लीजिए। क्रॉसिंग के साइन के ऊपर गाड़ियाँ नहीं लगतीं, न ही कोई बीच सड़क को पार करता दिखता है। बसों में बैठने और मेट्रो आदि के एस्केलेटर तक पर चढ़ने के लिए लोग पंक्तिबद्ध हो जाते हैं जो कि एक भारतीय के लिए आँखों में आँसू लाने वाला भावुक क्षण होता है।

मेट्रो स्टेशन बंकर-स्टाइल में बनाए गए हैं। बहुत ही गहरी खुदाई के बाद मेट्रो की सुरंगें बनी हैं जो कि किसी भी युद्ध या आपातकाल की स्थिति में मॉस्कोवासियों के लिए एक अभेद्य क़िले का रूप ले सकती हैं। इस पर बमों और मिसाइलों का कोई असर नहीं हो सकता, और हर नागरिक आधे घंटे के अंदर पास के किसी भी मेट्रो में दाख़िल होकर सुरक्षित पहुँच सकता है। हर स्टेशन और उसका प्लेटफ़ॉर्म अपने आप में एक कलात्मक अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट नमूना है।

उस इलाके के लोगों के सामान्य जीवन की मूर्तियाँ, मिलिट्री के लोगों की मूर्तियाँ, किसी साहित्यकार की रचनाओं के पात्रों की जीवंत कलाकृति, वॉल पेंटिंग आदि आपको प्रभावित करते हैं कि किसी प्लेटफ़ॉर्म को भी इस तरह से विकसित किया जा सकता है! आप मॉस्को मेट्रो लिखकर गूगल करेंगे तो आपको बहुत सारी तस्वीरें मिलेंगी जो आपको लगेंगी कि किसी म्यूज़ियम में होने चाहिए।

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यहाँ की मेट्रो ट्रेन के अलावा दो और ट्रेनों का आनंद लिया। एक तो डबल डेकर एक्सप्रेस ट्रेन थी। साफ सुथरी ज़रूर थी और समय से भी चल रही थी लेकिन जगह का अभाव था, केबिन में चार बिस्तर और बहुत ही कम जगह। भारतीय रेल की तरह जगह ज़्यादा नहीं था, जो कि थोड़ा उदास करने वाला मामला था मेरे लिए। दूसरी ट्रेन सैपसेन बुलेट ट्रेन थी जिसकी सर्वाधिक गति 250 के आसपास थी। हालाँकि भीतर बैठकर पता नहीं लग रहा था कि ट्रेन की गति इतनी ज्यादा है। ट्रैक के दोनों ओर मात्रा चार फ़ीट की जालियाँ लगी थीं जो कि जानवरों को ट्रैक पर आने से रोकने के लिए थीं। ज़ाहिर है कि वहाँ के लोग ये समझते हैं कि बुलेट ट्रेन की ट्रैक पर नहीं जाना चाहिए। भारत में ऐसा समझाना मुश्किल है।

लोग आमतौर पर मदद करने वाले और विनम्र ही मिले। विदेशियों को लूटने वाली प्रवृति नहीं दिखी। एक बार कैब में मुझे ड्राइवर ने ज्यादा पैसे लौटा दिए, मैंने ध्यान दिलाया तो उसने मुझे कहा, “कीप इट डियर, यू विल नीड देम।” ये कमाल की बात थी कि एक आम ड्राइवर इतना सोचता है। ये बात और है कि किसी कैब में मैं अपनी टोपी भूल आया! एक ड्राइवर ने तो हमें टॉफ़ी भी दिए खाने को। एक ने हमें भारतीय जानकर ‘मिथून चकरावरती’ की याद भी दिलाई। शाहरूख को भी कई लोगों ने याद किया, राज कपूर की फ़िल्में अभी भी बहुत लोकप्रिय हैं। कई बार डीके की दाढ़ी देखकर उसे ड्राइवरों ने ‘सलाम वालेकुम’ कहकर भी संबोधित किया।

भोजन के मामले में मॉस्को अंतरराष्ट्रीय शहर होने के कारण हर तरह के भोजन उपलब्ध कराता है। अगर खालिश रूसी भोजन की बात की जाए तो भारतीय ज़ायक़ा लेने वालों को घोर निराशा होगी। ये लोग ब्रेड जैसी बेस्वाद चीज़ें खाकर मस्त रहते हैं। मसालों के नाम पर नमक और काली मिर्च का पाउडर ही मिलता है भोजन में। माँस बहुत खाते हैं जिसमें बीफ, पोर्क, चिकन और डक बहुत ही आम है। बाकी, हर तरह के रेस्तराँ हैं जिसमें आपको रूसी, अमेरिकी, भारतीय, कॉन्टिनेंटल, इटैलियन आदि भोजन मिल जाएँगे।

एक ग़ज़ब की बात ये भी दिखी कि सिगरेट पीने की जगहें निर्धारित की हुई थीं कि ‘यहाँ सिगरेट पिएँ’। भारत में हर जगह ये लिखा होता है कि ‘यहाँ न पिएँ’, ये कहीं नहीं लिखा होता कि यहाँ न पिएँ तो कहाँ पिएँ। हर जगह डस्टबिन दिखे, और स्ट्रीट लाइटें काम कर रही थीं। मैं उस जगह रहता हूँ जहाँ सरकार पार्क में लाइट लगाती है तो लोहे के खम्बों सहित सारे लाइट सप्ताह भर में गायब हो जाते हैं। ऐसे में ये एक भावुक कर देने वाला समय था, मैं लगभग रो पड़ा था जब मैंने देखा कि क्राइस्ट द सेवियर की चर्च की सारी लाइटें काम कर रही थीं!

स्टैलिन की ‘सेवेन सिस्टर्स’ इमारतें और मॉस्को की रातें

मॉस्को की परिधि पर स्टैलिन ने आठ इमारतों को बनवाने की ख़्वाहिश की। इन सारी इमारतों को ऊँचा और भव्य होना था। इसके पीछे का तर्क ये था कि उस समय यूरोप और अमेरिका में ऊँची इमारतें बन रही थी और स्टैलिन रूस को दुनिया में एक बड़े देश की तरह दिखाना चाहता था। सात इमारतें बनीं जिनमें से मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी की इमारत 256 मीटर की सबसे ऊँची थी। ये 90 के दशक तक यूरोप की सबसे ऊँची इमारत रही।

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आठवीं इमारत किसी कारण से बन नहीं पाई। हर इमारत के सबसे ऊँचे वाले हिस्से में नुकीली आकृति या स्पीयर लगी दिखती है जो कि स्टैलिन को एक इमारत में लगाने के बाद भा गई थी। इसने फिर उसे हर इमारत में लगाने का आदेश दे दिया। ये सातों इमारतें मॉस्को में घूमते हुए आपको दिखते हैं। सबका रंग हल्का पीला है और इनका आधार बहुत ही चौड़ा। तस्वीरों में देखकर आप समझ जाएँगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।

नए तरह की इमारतें भी दिखती हैं लेकिन वो शहर के बाहर ही ज्यादा हैं। स्टैलिन की इमारतों के अलावा रूस के संसद के बैठने की पुरानी जगह ‘व्हाइट हाउस’ भी भव्य है। साथ ही क्रैमलिन, रूसी संसद, संग्रहालयों और चर्चों की इमारतों से पूरा मॉस्को पटा पड़ा है। कई होटलों की इमारतें भी शानदार हैं, जो कि पुरानी इमारतों में ही शायद खोल लिए गए हैं। इससे पता लगता है कि कॉरपोरेट को जगहें बेचकर पुरानी धरोहरों को तोड़ने की बजाय, उन्हें उनकी ही पहचान के साथ भी ज़िंदा रखा जा सकता है।

मॉल्स और शॉपिंग की जगहें भी बहुतायत हैं। मॉल्स महँगे भी हैं, और ठीक-ठाक प्राइस वाले भी। रेड स्क्वैयर के पास का ‘गम’ मॉल और एक अजीब से तीन अक्षरों के नाम वाला सुपर लग्ज़री मॉल इतना विशाल और महँगा है कि मुझे तेज सुसु न लगी होती तो ट्वॉयलेट ढूँढते हुए भी वहाँ न घुसता। मैं विंडो शॉपिंग आदि नहीं करता। जो ख़रीदना है, जहाँ ख़रीदना है वहीं जाकर ले लेता हूँ। जब प्राडा पहनना ही नहीं तो तीन लाख के ट्रेंचकोट को देखना भी क्यों! मेरी रूसी दोस्त ने भी कहा था कि देखने का मन हो तो घुस लेना लेकिन भूलकर भी कुछ भी मत ख़रीदना।

मॉस्को की मुख्य नदी मॉस्क्वा है जिसके नाम पर शहर का नाम है। इस नदी को बहुत ही खूबसूरत तरीक़े से शहर में जगह दी गई है। इसके किनारों को पक्का करके, इसमें रिवर क्रूज़ चलते हैं जिसपर बैठकर आप लगभग 27 जगहों को देख सकते हैं। हम जिस दिन बैठे उस दिन बहुत देर तक बारिश हो रही थी, और जब बारिश थमी तो हवा भयंकर तेज थी। हाथ जम गए थे जब हम वहाँ से फ़ेसबुक लाइव कर रहे थे। रिवर क्रूज़ रैडिसन होटल का था, जो थोड़ा महँगा है क्योंकि वहाँ अंदर आप भोजन और शराब का लुत्फ़ उठाते हैं। और जब लुत्फ़ उठाने लगते हैं तो जेब पर किसका ध्यान जाता है!

 

मॉस्को जाएँ तो दिन में तो पैदल चलें ही, रात में तो ज़रूर ही चलें। रात में ये शहर के अलग ही तरह के रंग में दिखता है। क्रिसमस और नववर्ष की तैयारी में एलईडी लाइटों से सजाया हुआ शहर एक अलग छटा बिखेरता है। शहर के बीच, नदी में इमारतों के रंगों से नहाए हुए प्रतिबिम्ब एक बेजोड़ अहसास देते हैं। चूँकि मौसम ठंढ का था तो तापमान लगभग शून्य या एक डिग्री के आसपास ही रहा। ऐसे में टहलने में और मज़ा आता है। बिना मैप के घूमते रहिए जहाँ-तहाँ। जिधर लोग दिखें, उधर चले चलिए। हाथ में कैमरा या फोन रखिए, बहुत यादें क़ैद हो जाएँगी।

रात की कहानी से याद आया कि हमने मॉस्को के एक बार, पापा’ज़ बार, और स्ट्रिप क्लब ‘वरजिन्स मेन्स क्लब’ का भी आनंद लिया। इन दोनों का वर्णन आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।


अगले हिस्से में सेंट पीटर्सबर्ग का वर्णन पढ़ें जिसमें पूरे ट्रिप का ख़र्च आदि भी बताया जाएगा।….

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