मेरठ एक्सप्रेस-वे का सच: यूपीए सरकारों ने सबसे ज़्यादा काम किया

कुछ दिन पहले मोदी जी ने, अपनी आदत के अनुसार, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के 9 किलोमीटर के हिस्से का फ़ीता काटकर हीरो बन गए, लेकिन असली बात कुछ और ही है। संघियों का हमारी सोशल मीडिया टीम से लेकर बिना पे-रोल पर काम करने वाले हमारे समर्थक पत्रकारों ने भी खूब मजाक उड़ाया। फ़ेसबुकिया स्टैंडअप पत्रकार भाइयों का सत्य बताने के लिए धन्यवाद। अब जबकि मोदी ने उद्धाटन कर दिया है, तो ये आगे तो बनने से रहा। हमने सरकार में दशकों गुज़ारे हैं, और हमारा अनुभव है, तो बता रहे हैं।

ये किसको पता है कि ये 96 किलोमीटर का है, और इसकी कल्पना 1999 में हुई थी। फिर अगले साल भी किसी स्पीच में बाजपेयी के मंत्री ने इसका नाम लिया था। फिर हमारी सरकार, यानि यूपीए प्रथम में जाकर हमने 2005 में इसे नोटिफाय किया। नोटिफाय किसने किया? हमने। क्रेडिट कौन ले रहा है? मोदी! पूरा सच सुनेंगे तो आपके गुर्दे लाल हो जाएँगे।

हमारी सरकार के आते ही इसपर काम, माने पेपर पर, युद्धस्तर पर चालू हुआ। 2006 में इसकी फीजिबिलटी रिपोर्ट बनाने की बात शुरु हुई और बजट में चिदम्बरम साहब ने प्रावधान किया कि इसे बना ही दिया जाए। 2008 में जाकर हमने, यूपीए सरकार ने, लगातार काम करते हुए प्रपोज़ल इन्वाइट किया। हमने सरकार चलाई है तो हमें पता है कि तीन साल तो कम ही हैं प्रपोज़ल बुलाने के लिए।

2009 में फिर हमने, 2006 में जिस फिजिबिलिटी रिपोर्ट को शुरु करने की बात की थी, उस स्टडी के लिए कन्सल्टेंट अपॉइंट कर लिया। खोजने में समय लगता है, खासकर उन्हें जो योग्य हों। स्टडी को कम्प्लीट करने के लिए हमने दो साल (मई 2010) का समय दिया और 2011 अगस्त में टार्गेट किया गया कि चार साल में तो ये 96 किलोमीटर लम्बी सड़क बना ही दी जाएगी। अक्टूबर 2011 में पता लगा कि फिडिबिलिटी रिपोर्ट अभी बनी नहीं है।

2013 में हमारे प्रधानमंत्री को इस लेटलतीफ़ी से गुस्सा आया कि भाई यूपीए प्रथम से द्वितीय ही नहीं, उसके ख़त्म होने का समय आ गया और अभी तक कुछ हुआ नहीं! गुस्से में तय हुआ कि 15 मार्च 2014 तक तो हर हाल में एक्सप्रेस बनाने का कॉन्ट्रैक्ट किसी को दे दिया जाए। जी, कॉन्ट्रैक्ट किसे देना है उसके लिए भी हम तारीख़ तय करते थे क्योंकि हर चीज का एक तरीक़ा होता है, एक सिस्टम है, प्रोसिज़र है। फर्जी डिग्री वाले मोदी जी हमारे नेता नहीं थे, बल्कि ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़े लोग हमारे देश की कमान संभाले थे।

फिर 2013 के नवंबर में ख़्याल आया कि इसके कुछ हिस्सों को (दिल्ली से यूपी गेट) छः लेन की जगह, चौदह की कर दी जाए क्योंकि ‘बड़ा है तो बेहतर है’। पैसा भी तय कर दिया कि 6,450 करोड़ में बना देना है। उसी महीने की 18 तारीख़ को कहा गया कि यूपी सरकार की जगह केन्द्र ही इसका निर्माण करेगी।

फिर क्या, हमारी सरकार ही चली गई वरना यूपीए तृतीय तक हम सीमेंट, गिट्टी, बालू, छड़ आदि से लेकर सारा इंतजाम कर लेते। तभी मोदी आ गया और हमारी सारी मेहनत को हथियाते हुए, न सिर्फ प्रोजेक्ट का कॉस्ट बढ़ा कर 7,855.87 करोड़ कर दिया बल्कि चौदह लेन वाले पहले हिस्से को समय से पहले ही ख़त्म कर दिया। समय से पहले कर दिया क्योंकि इनको सिस्टम मालूम नहीं, एक तरीक़ा होता है काम करने का।

इतनी हड़बड़ी का मतलब है कि इस पर रिपोर्ट बनाने वाले कन्सल्टेंट, मंत्रालयों में फ़ाइल खिसकाते ब्यूरोक्रेट से लेकर कई लोगों के पास टाइम पास करने का समय नहीं बचेगा। आखिर उनके हाथों से रिपोर्ट पास करवाकर आपने उन्हें खाली बैठा दिया! हम उन्हें काम दिया करते थे।

और तो और, ज़रा सोचिए कि यही अगर पाँच साल बाद पास होता, और फिर पाँच साल और बनने में लगते तो कॉस्ट थोड़ा और बढ़ता और कितने लोगों को ज़्यादा दिन काम करने का मौक़ा मिलता। आप कहेंगे कि वो मज़दूर कहीं और काम करेंगे! अरे! कहीं और कैसे काम करेंगे? रोज़ सड़कें थोड़े ही बनती हैं। उसको इतनी जल्दी बनवाया जाता रहा, तो कितने लोगों के पास काम नहीं रहेगा।

मोदी देश के लिए घातक है। इसको हटाइए। ये सब बातें आपको गोदी मीडिया नहीं दिखाएगी। और तो और हमारे अपने रवीश कुमार भी जो कि बिजली वाली बात पर राजीव गाँधी के समय की पीली किताबें चमका रहे थे, वो भी ये सब खोजकर नहीं ला पाए कि हमने सिर्फ नोटिफाय करने से लेकर, उसके बजट के पैसे बताने में दो सरकारें, और दस साल लगा दिए। इतनी मेहनत की चर्चा कोई नहीं करता। बस, ‘मोदी ओपन जीप में जाएँगे, मोदी सेल्फी लेंगे, पुतिन ने ये सड़क पर ट्रक चलाया, लोग पागल हो रहे थे’। यही सब कीजिए। देश जा रहा है कुत्तों के पास, जी हाँ, इट इज़ गोइंग टू द डॉग्स! सेव इट।

2019 में भारत बनेगा लंदन
इसलिए ब्रोज़, वोट फ़ॉर महागठबंधन

– अजीत भारती
मुख्य सोशल मीडिया मैनेजर
महागठबंधन आईटी सेल

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