ढाई लोगों का विचार है कि भारत स्त्रियों के लिए सबसे ख़तरनाक देश है

550 मूर्खों से ‘राय’ ली गई और घोषित कर दिया गया कि भारत दुनिया का सबसे असुरक्षित देश है महिलाओं के लिए। ये मूर्खता थॉमसन रॉयटर्स फॉउन्डेशन ने किया है। ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकतें होती रहती हैं इसलिए गम्भीरता से मत लीजिए। क्यों? नीचे पढ़ लीजिए।

इस सर्वे में ये पूछा गया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 सदस्य देशों में कौन-से देश महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित थे। उन्हें ऐसे पाँच देशों के नाम बताने थे। अब आप ये सोचिए कि इन 550 तथाकथित जानकारों की मंडली में ऐसे कितने लोग होंगे जो बीस से ज़्यादा देशों का नाम भी जानते होंगे और दो से ज़्यादा देश की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सेवा, यौन हिंसा, मानव तस्करी, स्त्री सुरक्षा आदि तमाम विषयों की जानकारी रखते होंगे। बस सोचिए कि ये परमज्ञानी कौन हैं जिन्हें 193 देशों के इन विषयों की इतनी जानकारी है कि वो अपने ज्ञान के आधार पर पाँच ख़तरनाक देशों के नाम गिना सकें। 

आप बस सोचिए। दो, चार, दस देश के बारे में तो जानकारी रख भी ले आदमी, लेकिन 193 में से टॉप पाँच उन्होंने कैसे चुना, किस आधार पर चुना जिसमें उन्हें ऊपर के सारे विषयों की जानकारी है। अगर ये जानकारी ‘क्वालिटेटिव’ है तो मुझे ये पूर्णतः बकवास लगता है क्योंकि ऐसा एक्सपर्ट्स या तो इंटरनेट पर आर्टिकल सर्च करके बना जा सकता है, या फिर आपके पूर्वाग्रह हैं जिसकी टट्टी आपने मुँह से कर दी है। अगर ये ‘क्वांटिटेटिव’ है, तो फिर ‘एक्सपर्ट’ के ‘विचार’ क्यों माँगे गए, आँकड़े क्यों नहीं दिए गए सारे देशों के? 

और अगर ये परमज्ञानी हैं, तो फिर इनसे सिर्फ पाँच देशों के ही नाम क्यों माँगे गए, सारे 193 देशों को अलग-अलग पैरामीटर्स पर रैंक करने क्यों नहीं कहा गया? ये तो वही बात हुई कि पूरी दुनिया के राजनेताओं पर सर्वे हो, और राजदीप, रवीश तथा बरखा दत्त से पूछ दिया जाए कि पाँच देशों के सबसे बुरे राजनेताओं के नाम बताइए। ज़ाहिर सी बात है मोदी ब्रो टॉप कर जाएँगे, और ख़बर चलेगी कि ग्लोबल सर्वे में मोदी सबसे बुरे नेता साबित हुए। 

जवाब देने वाले ‘एक्सपर्ट्स’ ने कहा कि भारत सबसे ख़तरनाक देश है जहाँ मानव तस्करी, सेक्स स्लेवरी, घर में नौकरों जैसा बर्ताव, और ज़बरन विवाह, पत्थर से औरतों को मारना और भ्रुण हत्या जैसी ‘परम्परागत प्रथाएँ’ शामिल हैं।

ऐसा नहीं है कि भारत दुनिया का सबसे अच्छा देश है स्त्री सुरक्षा के मामले में लेकिन सबसे बुरा है, ऐसा मानना घनघोर बकवास लगता है। जैसे कि ये जानकर ताज्जुब होगा कि महिलाओं के बलात्कार के मामले में भारत दुनिया के टॉप दस देशों में दूर-दूर तक नहीं आता।  इस लिस्ट में आपको सबसे ज़्यादा शिक्षित, विकसित और बेहतरीन अर्थव्यवस्था वाले तमाम देश आएँगे जिसमें यूएसए से लेकर स्वीडन, साउथ अफ़्रीका और कई यूरोपीय देश हैं। 

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रूस में कैमरे पर रिपोर्ट देती महिला को मोलेस्ट कर दिया गया वर्ल्ड कप के दौरान। अमेरिका की हर पाँचवी लड़की या औरत का या तो रेप हो चुका है, या मोलेस्टेशन। स्वीडन में जनसंख्या अनुपात की दृष्टि से सबसे ज़्यादा बलात्कार होते हैं। अमेरिका और यूरोप में हर पाँचवी से लेकर हर तीसरी लड़की बचपन में ही मोलेस्टेशन का शिकार हो चुकी होती है। 

ख़ैर, ये तो आँकड़ों की बात है जो आप इंटरनेट से ले सकते हैं। अब आइए ऐसे ‘सर्वे’ पर जिसका सैम्पल साइज़ 550 होता है। जब हम शोध या सर्वे आदि करते हैं, और उनके परिणामों को ‘सार्वभौमिक सत्य’ की तरह बताते हैं तब हमारा सैम्पल इतना विशाल होना चाहिए कि ‘यूनिवर्स’ के हर सबग्रुप का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे। आमतौर पर, सैम्पल को पूरे ‘यूनिवर्स’ का कम से कम 10% होना चाहिए ताकि वैसे सर्वे का परिणाम सत्य के जितना ‘निकट’ हो सकता है, हो। भारत की जनसंख्या  130 करोड़ है। इसमें महिलाएँ लगभग 60 करोड़ मानिए। शिक्षित महिलाएँ 36 करोड़ होंगी। वैसे भी दुनिया की बात करें तो लगभग साढ़े तीन अरब महिलाएँ हैं। 

अब जो 550 लोग हैं, जिन्हें रॉयटर्स ‘एक्सपर्ट’ मानता है, उस अवधारणा पर मेरा सवाल यह है कि स्त्री सुरक्षा के बारे में क्या एक्सपर्ट बात करेंगे? क्या ये पार्टिकल फ़िज़िक्स है या फिर क्वान्टम मैकेनिक्स कि इस पर एक्सपर्ट्स की राय ली जाए? ये एक बहुत ही सीधा-सा विषय है जिसके लिए आप पाचँ से दस सीधे सवाल पूछकर जानकारी जुटा सकते हैं। साथ ही, यही सारे सवाल दुनिया के हर देश के सैम्पल से पूछा जाना चाहिए। 

कमरे में बैठकर, न्यूज़ रिपोर्ट पढ़कर अगर शोध के नतीजे लिखे जाने लगे तो केजरीवाल भारत के प्रधानमंत्री होते और नया संविधान ले आते। लेकिन ऐसा ज़मीन पर नहीं हो पाता। मतलब ग़ज़ब की बात यह है कि भारत में ‘स्टोनिंग’ जैसी प्रथा हैं, जिसका भारतीयों को पता भी नहीं। मुझे नहीं लगता कि मैंने तीस सालों में भारत में किसी औरत की पत्थर मारकर हत्या की जाने की बात पढ़ी होगी। हो सकता है एक-दो ख़बरें हों जो मैं नहीं पढ़ सका, लेकिन इसे आम बता देना अलग दर्जे की धूर्तता है। 

अब इस वाहियात सर्वे की टाइमिंग देखिए। पिछली बार ऐसी टट्टी रिपोर्ट 2011 में आई थी। इसे अभी 2018 में लाने के पीछे का क्या उद्देश्य है? हर पाँच साल पर कर लेते। 2016 में ले आते, या दस साल के बाद 2021 का इंतज़ार कर लेते। इसी बहाने इन टट्टी एक्सपर्ट्स की राय और विकसित हो जाती। 

मतलब आप यह सोचिए कि इन एक्सपर्ट्स के एक्सपर्टीज़ का दायरा कितना व्यापक है कि इन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक या परम्परागत प्रथाओं, यौन हिंसा और छेड़-छाड़, दूसरे तरह की हिंसा और मानव तस्करी जैसे सारे विषयों पर अपनी राय रखी है। इतना एक्सपर्ट नॉलेज तो हमारे यहाँ बस पान और गुटखा बेचनेवाले दुकानदारों को ही होता है। उनसे रॉयटर्स वालों ने तो नहीं ही पूछा होगा। 

इन्होंने भारत के भी 550 लोगों को नहीं पूछा, पूरे दुनिया से लिए हैं। उनका अनुपात उठाएँगे तो हर देश के हिस्से ढाई एक्सपर्ट आएँगे। मतलब ढाई लोगों का विचार है कि भारत स्त्रियों के लिए सबसे ख़तरनाक देश है। शाब्बास! अच्छा है… बहुत अच्छा है!

ये धूर्तता है। ऐसे धूर्त रिपोर्ट अब आते रहेंगे और पश्चिमी हेजीमनी के हिसाब से ये इमेज खराब करने और लीपापोती का कार्यक्रम लगातार चुनावों तक होता रहेगा। इन्हें गम्भीरता से मत लीजिए। क्योंकि न सिर्फ इस सर्वे में बुनियादी समस्याएँ हैं, बल्कि ये राजनीति से मोटिवेटेड भी है। जिस सर्वे में भारत को ‘स्टोनिंग’ के मामले में नंबर एक पर रखा गया हो, वो सर्वे अपनी ही गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ कहता है। चिल मारिए, बकवासों से बचिए। 

 

 

 

 

 

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