उत्तराखंड मेडिकल कॉलेज फीस कांड: क्या मेडिकल की पढ़ाई इतनी सस्ती है?

मुझे कहा गया कि मैं इस पर लिखूँ। ज़ाहिर है कि लोग सोचेंगे कि मैं सरकार को डिफ़ेंड करते हुए लिखूँगा जबकि यहाँ पर सरकार का बहुत ज़्यादा काम है नहीं। जो लोग जानकार हैं, उनको पता है कि मेडिकल की फीस देश के ठीक-ठाक कॉलेजों में औसतन कितनी है। एक कॉलेज ने, उत्तराखंड सरकार द्वारा निजी मेडिकल कॉलेजों (राज्य के कुल तीन) को अपनी फीस तय करने की छूट देने पर, अपनी फीस अचानक से तीन गुणा बढ़ा दी।

पाँच लाख से ये सीधा 15 को पहुँच गया। ज़ाहिर सी बात है कि आपका, हम सबका दिमाग खराब हो जाएगा क्योंकि हमने तो पूरी स्कूलिंग लाख-दो लाख में कर ली होगी और बैचलर्स की पढ़ाई पाँच हजार रूपए सालाना देकर की। मेरी स्कूलिंग तो खैर बहुत महँगी थी, लेकिन बीए मात्र 15 हज़ार में और एमए एक लाख के भीतर ही हो गया।

लेकिन मेडिकल, एमबीए, बीटेक और बीए अलग पढ़ाई हैं। एक कला संकाय बनाने में उतनी इन्वेस्टमेंट नहीं लगती जितनी मेडिकल कॉलेज के मात्र एक लैब को बनाने में लगती है। इसलिए कुछ पढ़ाई महँगी है, कुछ सस्ती। मेडिकल कॉलेजों को अपनी फीस तय करने की छूट होनी चाहिए लेकिन एक तय दायरे में। मुझे नहीं पता, लेकिन मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया शायद ये तय करती हो कि इस रेटिंग के कॉलेज इतने तक ही फीस ले सकते हैं। अगर ऐसा नहीं है, तो ऐसा होना चाहिए। रेटिंग उनकी गुणवत्ता, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, शिक्षकों की संख्या आदि मापदंडों को ध्यान में रखते हुए

मेरा विरोध यहाँ है। लेकिन वो फीस बढ़ने को लेकर नहीं है। विरोध इस बात से है कि जब सरकारों को और भी सरकारी कॉलेज खोलना चाहिए तो वो वैसा न करके, स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट घटाकर, निजी संस्थानों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर व्यक्ति न तो इतना पैसा देने में सक्षम है, न ही लोन लेने में। लोन लेने की प्रक्रिया इतनी भयावह है कि ग़रीबों को शिक्षा संबंधित लोन मिल भी नहीं पाता।

ऐसे में सरकार अगर प्राइवेट कॉलेजों को सब्सिडी भी न दे, और फीस भी बढ़ाने से रोक दे तो उसका सीधा असर घटिया शिक्षा के रूप में दिखेगा। इसलिए भी दायरे में रहकर फीस तय करने की स्वतंत्रता संस्थानों को होनी चाहिए। मेरा विरोध इस बात को लेकर है कि क्या वर्तमान कॉलेज-हॉस्पिटल इतने हैं, या इस स्थिति में हैं कि योग्य गरीब छात्रों की संख्या को दाख़िला मिल सके। जवाब है: नहीं।

मेडिकल की पढ़ाई महँगी है। आप कहीं के भी मेडिकल कॉलेज की फीस की (गुणवत्ता को ध्यान में रखकर) तुलना कर लीजिए, भारत में कम ही होगी। एक कॉलेज ने बढ़ाया है, उसने छात्रों को पहले ही बता दिया था कि कोर्ट में केस चल रहा है और फीस बढ़ सकती है। छात्रों ने उस एफिडेविट पर साइन किए हैं।

अब बात आती है कि क्या 20 लाख फीस ज़ायज है? मैं उस स्थिति में नहीं हूँ कि बता दूँ कि ज़ायज है कि नहीं। लेकिन सामान्य विवेक ये कहता है कि अगर ढंग की जगह से एमबीए करने में 15 लाख लगते हैं, तो मेडिकल की फीस तो उससे ज़्यादा ही होगी। अगर छात्रों को पता नहीं होता कि फीस बढ़ जाएगी, और बढ़ा देते क्योंकि सरकार ने छूट दी, तो ये ग़ैरक़ानूनी क़दम होता। आपको बेहतर शिक्षक, इन्फ़्रास्ट्रक्चर और लैब्स चाहिए तो फीस बढ़ेगी ही। ये सिर्फ एक कॉलेज में हुआ है, अगर ये बहुत ज़्यादा है तो सरकार उस पर कोई ‘कैप’ लगाए।

जिस देश में नर्सरी और प्राथमिक कक्षा के बच्चे तीन से पाँच लाख रूपए सालाना देकर पढ़ाई करते हों, वहाँ निजी संस्थान मेडिकल की पढ़ाई के लिए इतने फीस लेगी ही। बच्चों के साथ अन्याय तब होता जब उन्हें जानकारी नहीं होती कि फीस बढ़ जाएँगे। कॉलेज प्रशासन कह रहा है कि उन्होंने इस बात पर साइन किया था और तब एडमिशन लिया था।

जानकारी के लिए बताता चलूँ कि बिहार के कटिहार मेडिकल कॉलेज की औसत फीस लगभग 12 लाख/साल है, AVMC पोंडिचेरी की 16 लाख/ साल, विनायक मिशन (दो-तीन जगह) की 20 लाख/साल, PIMS की 18 लाख/साल, संतोष यूनिवर्सिटी ग़ाज़ियाबाद की 16 लाख/साल, ईरा’ज़ लखनऊ मेडिकल कॉलेज की 17 लाख/साल, पैसिफ़िक मेडिकल यूनिवर्सिटी उदयपुर की 18 लाख/साल, GITAM विशाखापत्तनम की 16 लाख/साल…

मेडिकल की पढ़ाई सस्ती भी है बहुत जगह, जहाँ फीस हज़ार में ही है लेकिन जिस कॉलेज पर बात साधी जा रही है, वो केस लड़ रही थी और जीती। कैबिनेट ने मंज़ूरी दी कि राज्य के तीन निजी कॉलेज फीस बढ़ा सकते हैं। एक कॉलेज बनाने में सैकड़ों करोड़ का ख़र्च आता है, उसको चलाने में भी ख़र्च आएगा। अगर संस्था फीस तय नहीं करेगी तो वो फिर कॉलेज बनाए ही क्यों? ऐसा तो है नहीं कि बाकी कहीं भी इससे ज़्यादा फीस नहीं है।

अगर ये ग़ैरक़ानूनी या एक स्तर से ज़्यादा पैसा माँग रहा है तो मेडिकल काउंसिल और कोर्ट हैं इसके लिए।

अपडेट: पोस्ट लिखने के दो घंटे बाद ख़बर आई कि कॉलेज ने फीस की वृद्धि वापस ले ली है। 

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