असम में 50 लाख बंग्लादेशियों की शिनाख़्त पूरी, मीडिया के मातम का इंतज़ार करें

 

असम से पचास लाख बंग्लादेशी मुसलमानों को वापस भेजने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में ऐसे लोगों के वैरिफिकेशन के प्रोसेस का दूसरा चरण पूरा हो चुका है और लगभग पाँच मिलियन लोगों के पास कोई भी दस्तावेज़ या सबूत नहीं हैं जिससे ये साबित हो कि वो भारत में 1971 के पहले से रह रहे हैं।

वोटबैंक की राजनीति के तहत घुसपैठियों, और कई बार आतंकियों को, पनाह देकर आधार और राशन कार्ड बाँटने वाली सरकारों की ग़ैरक़ानूनी नीतियों पर इसके बाद शायद रोक लगे। जून तक फ़ाइनल रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को जानी है, फिर इन्हें वापस अपने देश रवाना किया जाएगा।

राज्यों की डेमोग्रफी बदलने की कोशिश में, ताकि इनकी पार्टियाँ सत्ता में ऐसे मुसलमान वोटरों के वोट से बने रहें, देश के संसाधनों के दुरुपयोग से लेकर सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बने इन बंग्लादेशियों को वापस भेजना बहुत जरूरी है। हम कनाडा या ऑस्ट्रेलिया नहीं हैं जहाँ अथाह संसाधन हैं, और लोग कम हैं। हमारे पास संसाधन भी कम हैं, और जनसंख्या पहले से ही ज़्यादा है।

अब आपको कुछ ऐसी ख़बरें मिलेंगी जिनको इस हिसाब से लिखा जाएगा मानो फ़लाँ आदमी के पास के दस्तावेज़ आग में जल गए थे, कोई धर्म के नाम पर सताया जा रहा है आदि। ऐसे मानवीय संवेदनाओं से भरी कहानियाँ कहने वालों में बीबीसी हिन्दी, वायर, स्क्रॉल, क्विंट और एनडीटीवी जैसे अजेंडाबाज साइटें होंगी।

कहानी शुरु होगी कि नूर के छः बच्चे हैं, पति मर चुका है, और उसका कहना है कि वो हमेशा से असम में ही रहे हैं। उसके बेटे को ग़ालिब बहुत पसंद है, और वो कविता करता है। छोटा लड़का तीसरी क्लास में है और गणित में बहुत बढ़िया है। जब तक रिपोर्टर नूर से बात कर रहा था, मासूम-सी मुस्कान लिए नूर की बिटिया ने उन्हें चाय बनाकर दी जिसे पीकर रिपोर्टर ने तय किया कि इससे बेहतर चाय उसने कभी पी ही नहीं।

आगे रिपोर्ट में ये बताया जाएगा कि जब से भाजपा सरकार आई है, एक ख़ौफ़ का साया है। पुलिस रात-बेरात कभी भी उनसे पूछताछ करने आ जाती है। नूर के चेहरे पर एक डर को देखा जा सकता था। बड़ा बेटा बारहवीं में है और डॉक्टर बनना चाहता है। उसकी तमन्ना है कि वो अपनी मातृभूमि और समाज में योगदान दे।

लेकिन वो ऐसा शायद नहीं कर पाए क्योंकि जल्द ही अपने जैसे कई परिवारों की तरह नूर और उसके बच्चों को ज़बरन किसी वैसी जगह पर भेज दिया जाएगा, जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं। उनके लिए तो भारत ही उनका देश था, मातृभूमि थी। आगे रिपोर्टर अंतिम पैराग्राफ़ में बताएगा/बताएगी कि मानवीय संवेदना दक्षिणपंथी सरकारों के फासिस्ट अजेंडे में फ़िट नहीं बैठता और धर्म के नाम पर शिनाख़्त करके लोगों को सताना किसी भी सुपर पावर बनने की चाहत रखने वाले देश के लिए सही नहीं।

आप पढ़ेंगे और शेयर करेंगे क्योंकि आप संवेदनशील हैं। हालाँकि आपको ये पता नहीं होगा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में कई स्तर के वैरिफिकेशन के बाद देश की सुरक्षा को नज़र में रखते हुए ये क़दम उठाए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *