हम बिहारी हैं, दूब, कुचले और पतित भी क्योंकि क्रांति के नाम पर जाति पकड़ते हैं

एक बदचलन भीड़ बना दी गई कामगार आबादी कभी मराठियों से पिटती है, कभी गुजरातियों से मार खाती है, कभी किसी ट्रेन के नीचे आ जाती है। 

ये बदचलनी भी उसकी मजबूरी ही है। पेट और परिवार के लिए आदमी हर तरह के कष्ट लेता है। इस कष्ट में पिटाई, आगजनी, और सामूहिक मौतें भी शामिल होती हैं। 

सुनियोजित षड्यंत्र कि देश के कई शहरों को बिहार से सीधा ट्रेन से जोड़ दिया गया वरना अमृतसर-सहरसा ट्रेन की क्या ज़रूरत है? आखिर सीधी ट्रेनें, वो भी इतनी तादाद में हरियाणा, पंजाब, गुजरात जैसी जगहों पर क्यों जाती हैं? 

क्राइसिस बनाकर अमेरिका और यूरोप के चंद देश सीरिया, लीबिया आदि को तबाह करते हैं ताकि उनके यहाँ के हुक्मरान ‘मिनिमम वेज’ (न्यूनतम मज़दूरी) के बिल पर भी दस्तखत कर सकें, और फिर सीरियाई शरणार्थियों की फ़ौजें, औने-पौने मज़दूरी पर उनके देशों की कम्पनियों में अनस्किल्ड लेबर के काम करें।

बिहार में, यूपी में उद्योग लग जाएँगे, वहाँ क्रिमिनल एक्टिविटी कम हो जाएगी, वो रहने लायक जगह हो जाएँगे तो फिर उन राज्यों में ईंट ढोने से लेकर कोलतार पसारने, और धान रोपने का काम कौन करेगा? 

नेताओं को सुनकर हमें लगता है कि ये राष्ट्रीय आस्मिता, देश की अखंडता और एकता की बातें करते हैं, जबकि हर नेता (चाहे किसी भी पार्टी का हो) एक बिजनेसमैन होता है, जो कि ऐसे कारनामों को अंजाम देता है कि पीढ़ियाँ चुक जाती हैं उसे समझ पाने पाने। 

क्राइसिस अगर सुलझ जाए तो फिर हथियार कौन ख़रीदेगा? क्राइसिस अगर सुलझ जाए तो इन राजधानियों को जोड़ती ट्रेनों में कोई क्यों चढ़ेगा? आखिर ढंग के उद्योग यहीं लगा दिए जाएँगे तो खेतों में धान कौन रोपेगा? आखिर यहीं पर मज़दूरों को पाँच हजार रूपया हर महीने बचने लगे तो वो गुजरात की किसी फ़ैक्ट्री में दस हजार की मज़दूरी क्यों करेगा?

बिहार अब बेतहाशा मूर्खों की जन्मस्थली है। चाणक्य और मौर्य साम्राज्य चला गया, नालंदा और विक्रमशिला अब खंडहर हैं। जब जनसंख्या का बड़ा हिस्सा किसी भी काम की शिक्षा नहीं पाता, सरकारें नौकरियों के उपक्रम नहीं पैदा कर पातीं, तो फिर वो जाएगा कहाँ? ज़िंदा तो रहना ही है, चाहे आग लगा दो, लुंगियाँ देखकर डंडे मारो, ट्रेनों से फेंक दो… 

हम वहीं जाएँगे, हमें ज़िंदा रहना है। हम बिहारी हैं। हम मज़दूर हैं। हमें इसी बात में मज़ा आने लगा है कि हम किसी भी कारखाने को बंद कर सकते हैं जबकि हँसनेवाली बात यह है कि हम वहाँ के मज़दूर हैं, मालिक नहीं। फिर ये गौरव किस बात का?

गाँधी की बातों को शायद बहुत गम्भीरता से ले लिया कि कोई काम छोटा नहीं होता? कोई काम छोटा नहीं होता, लेकिन हर वैसा छोटा समझा जानेवाला काम एक बिहारी ही क्यों करता है? और उसी छोटे काम को करने को लिए वहीं के लोग क्यों नहीं आते, बिहार से ट्रेन पकड़कर उसे अहमदाबाद, जयपुर, सोनीपत और अमृतसर क्यों जाना पड़ता है? 

मूर्ख इसलिए कि हम आज भी जाति देखकर हर काम करते हैं। मिलनेवाला यह कहकर मिलता है कि ‘हम तो भूमिहार हैं’, ‘हम भी लाला ही हैं’, ‘दोनों आदमी जादब ही हैं सर’, ‘आप राजपूत हैं क्या?’ इस जातिगत अस्मिता ने क्या दे दिया है हमें, ये मुझे पता नहीं, लेकिन राजनीति को इतना बर्बाद किया है कि कोई काम इससे अछूता नहीं है। 

लेकिन समाधान भी क्या है? सड़कों पर एक लाख लोग उतरे थे तो जेपी ने देश को झुका दिया था। लेकिन उसी जेपी के चेले ऐसे-ऐसे आए कि उनके समाजवाद और सामाजिक न्याय के कीलों से बिहार बिंधा पड़ा है। दो लाख लोग सड़क पर आ जाएँ, विधानसभा घेर लें, इन नेताओं को बंधक बना लें, सारे सरकारी काम करने से इनकार कर दें, तो क्या कुछ बदलेगा? 

पता नहीं। हम समाधान भी वही देखते हैं जैसा कहीं पहले हुआ हो। क्या पता कुछ नया हो जाएगा, कोई पागल एक दिन कुछ बदल देगा। लेकिन तब तक बिहारी भीड़ का हिस्सा बनकर पिटते और मरते रहेंगे, ये तय है क्योंकि जीने की कोशिश में कभी-कभी समय से पहले मरना भी पड़ता है। ऐसे ही होता है, ऐसा ही होता रहेगा। 

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