खाली समय में लेखक के दिमाग का पागलपन

बहुत समय पहले मैंने एक कहानी आपसे शेयर की थी जिसमें मैंने ज़िक्र किया था कि मेरा रूम हीटर खराब होने पर मैंने दुकानदार के साथ क्या किया था। वो बहुत ही हिंसक घटना थी। ख़ून नहीं निकला था, लेकिन पढ़ने से, उसकी हिंसा का भान हो जा रहा था कि करने वाला कितना क्रुद्ध रहा होगा। जबकि मैंने जब वो लिखा, मैं मज़े से चाय पी रहा था और सोच रहा था कि अगर उस दुकान वाले ने एक दिन और देर कर दी तो उससे हथौड़ा माँगूँगा और…

मुझे नहीं मालूम कि आपमें से कितने लोग मन ही मन ऐसी कहानियाँ बनाते हैं। आँख बंद करने पर फ़िल्म की तरह कुछ दृश्य चलते हैं दिमाग में। मैं सपने भी देखता हूँ तो लगभग आधा जगते हुए जहाँ मैं अपने सपने को अपने हिसाब से दिशा दे देता हूँ। बाद में पता चला ऐसा बहुत लोगों के साथ होता है, इसको ‘लूसिड ड्रीमिंग’ कहते हैं। 

विज्ञान कहता है कि हमारा दिमाग हमेशा काम करता रहता है। मेरा तो करता है। कई बार किसी एक पात्र को लेकर, वो जीवंत हो सकता है, (आपका दोस्त, दुश्मन, पूर्व प्रेमिका, क्रश, काश कि वो प्रेमिका होती वाली प्रेमिका) आप उसे मनचाहे प्लॉट में घुमाते हैं, और नचाते हैं। मैं अपने खाली समय में अक्सर यही करता रहता हूँ। ये क्रूर, वीभत्स, अत्यंत हिंसक से लेकर अश्लील, नर्म और बेहद शांत हो सकता है। 

अभी एक मित्र (अराहान असफल के नाम से लिखते हैं) के फ़ेसबुक वॉल पर उनका अपनी डायरी से किसी कथित हत्या को लेकर मन के उहापोह का चित्रण पढ़ा। वहाँ वो लिख रहे होते हैं कि उन्होंने हत्या की, या नहीं की, किस बात पर कर सकते थे, कौन सी बात पर उनका क्रोध ट्रिगर होकर किसी की हत्या पर मजबूर कर सकता था आदि। 

कई बार हम जो सोचते हैं, या सोचना चाहते हैं पर सामाजिक दबाव में हमारा चेतन मन उसे बाहर आने ही नहीं देता। वो सोच, वो अभिव्यक्ति कई कारणों से दबी रह जाती है। जैसे कि मेरी इच्छा होती है कि मैं एक स्नाइपर गन ले लूँ और बालकनी में लगा दूँ। फिर रात के ग्यारह बजे के बाद से जो भी मोटरसाइकिल वाला ‘फट-फट-फटाक’ की आवाज़ वाले साइलेंसर लगाए नीचे से गुज़रे उसे पीठ पर गोली मारकर मार ही दूँ। (कल को मैं किसी हत्या में नामित हो जाऊँ, तो पुलिस इसका भी इस्तेमाल कर सकती है!)

ऐसे ही ख़्याल आपके किसी दुश्मन के लिए आते होंगे कि मिल जाए तो उसे पटककर इतना मारूँ कि हाथ-पैर टूट जाए। मेरी ऐसी इच्छा तब होती है जब मैं जानता हूँ कि सामने वाले को मैं नहीं मार पाऊँगा भले ही वो गलत है क्योंकि वो मुझसे ज़्यादा हृष्ट-पुष्ट है। तब दिमाग में एक फ़िल्म चलनी शुरु होती है, जिसमें मैं उस व्यक्ति से बात करता हूँ, उसे उकसाता हूँ, और जब वो मेरी तरफ़ बढ़ता है तो मैं पास पड़ा सरिया उठाकर उसके अंदर घोंप देता हूँ। ये सरिया कहीं नहीं होता, न ही संवाद करने का कोई स्कोप होता है, पर मैं संवाद करता हूँ, फिर वो नहीं मानता और मुझे वो क़दम उठाना पड़ता है। 

ऐसा ही तब होता है जब मैं अपनी पूर्व प्रेमिकाओं के बारे में सोचता हूँ। घर में बैठे-बैठे मैं उससे मेट्रो के दरवाज़े पर अपने घुसते और उसके निकलते हुए मिल लेता हूँ, और कह देता हूँ, “यार दो मिनट हैं क्या तुम्हारे पास?” फिर वो अजीब निगाहों से मुझे घूरती है, और मैं फिर मेट्रो छोड़ देता हूँ। वो पूछने में भी झिझकती है कि अब इसे क्या चाहिए, ये फिर से वापस आने की बात तो नहीं कर रहा। मैं उसकी बात समझते हुए कह देता हूँ, “उस समय हालात अलग थे, मैंने तुम्हें बहुत बुरा-भला कहा, हो सके तो माफ कर देना।” 

कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं, या उसे अपने हिसाब से जीना चाहते हैं। जैसे कि मैं किसी का जेब काट लूँ तो क्या होगा। पूरी प्रक्रिया चलती है दिमाग में कि कैसे काटना है, पकड़ा गया तो कितनी मार पड़ेगी, मारते-मारते लोग मार ही देंगे या कुछ लोग बचा लेंगे, अगर सफल हो गया और बटुए में पैसे न हों, पैसे खूब हों तो, फिर उसके कार्ड भी मिलें जो ज़रूरी हों तो क्यों मैं उन्हें पोस्ट कर दूँगा वापस! ये सब भी होता है, और बहुत ही सामान्य बात है। मैं तो यहाँ तक सोच लेता हूँ कि मार खाऊँगा तो किस हाथ या पैर पर कितनी चोट आएगी, ख़ून निकलेगा कि नहीं, होंठ फटेंगे कि नहीं… 

वैसे ही कोई किसी हत्या, प्रेम प्रसंग, नोंक-झोंक पर सोच सकता है। जैसे कि गर्लफ़्रेंड के साथ ही कोई बात हुई और आप ये सोच रहे हों कि ये कह देता, तो वो ऐसा कहती, फिर मैं ऐसा कह देता, और फिर वो न होता जो हो गया! 

ये सब किसी आधी सोची हुई सोच की परिणति होती है। हमें ‘क्लोज़र’ नहीं मिलता। हमारे जीवन की वो घटनाएँ वैसे नहीं बीतती जैसे हम उसे होते देखना चाहते हैं। इसी कारण हम उसे बार-बार अपने तरीक़े से ख़त्म करते रहते हैं। 

लेखक का काम लिखना है। उसके आधार में ‘देखना’ होता है। वो हर चीज को आम लोगों से गहरे जाकर देखता है। वो लोगों को पढ़ता है ताकि वैसे पात्र को किसी काम में लगा सके। किसी पान की दुकान से किसी को उठाकर वो अपनी किताब में दुकानदार बना देता है। किसी कॉलेज जाते लड़के की बातें सुनकर, उसी दिशा में एक लड़की छोड़ देता है और देखता है कि दोनों क्या करते हैं। 

अंतहीन पात्र, अंतहीन परिस्थितियाँ, अंतहीन नौटंकियाँ और अंतहीन एकांत। ये आपके दिमाग को व्यस्त रखता है। आपको एक चैलेंज देता है कि क्या उस पात्र को ऐसे ही रखना है, या फिर मोड़कर ऐसा बनाना है। ये सेल्फ़-इवैलुएशन का प्रोसेस है। ये सबसे पहली सीढ़ी होती है अपनी कृति को नंबर देने की। लिखकर मिटाने से पहले हम सोचकर मिटाते हैं। ये एक सतत प्रक्रिया है। 

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