जस्टिस भंडारी को वर्ल्ड कोर्ट की सीट मिलने के मायने

सुबह-सुबह ख़बर पढ़ी की भारत के दलवीर भंडारी को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस की आख़िरी सीट के लिए चुन लिया गया है। जो लोग इस ख़बर पर नज़र बनाए हुए थे, उन्हें पता होगा कि इस 15 जजों वाली संस्था में, जिसे वर्ल्ड कोर्ट भी कहा जाता है, आज की तारीख़ में, इसके 71 साल के इतिहास में पहली बार, कोई भी ब्रिटिश जज नहीं है।

यूएन में भारत के डिप्लैमैट सैयद अकबरूद्दीन जी के आक्रामक नेगोसिएशन और कैम्पेनिंग के कारण भारत के जेनरल असेंबली में दो तिहाई वोट (121-68) मिल गए थे। इतने ही वोट सिक्योरिटी काउंसिल से भी मिलने थे, जहाँ ब्रिटेन के ग्रीनवुड को 9-6 की बढ़त हासिल थी। यूएन के नियमों के हिसाब से जिसे चुना जाना है, उसे इन दोनों ही संस्थाओं में दो तिहाई बहुमत चाहिए।

सिक्योरिटी काउंसिल में सीक्रेट बैलट से 11 राउंड वोटिंग हुई जिसमें अंत के राउंड में भारत के वोटों की संख्या में वृद्धि हुई। चूँकि जेनरल असेंबली में भंडारी को प्रबल समर्थन मिल रहा था, और सिक्योरिटी काउंसिल सीक्रेट बैलट के कारण उस मूड को समर्थन नहीं दे रहा था तो ये बात ‘परमानेंट फ़ाइव’ बनाम ‘रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड’ हो गया। साथ ही, ये माहौल बन गया कि तथाकथित बड़े देश अपनी दादगीरी चलाते रहेंगे।

भारत पिछले कुछ समय से यूएन में हमेशा सुधारों की ज़रूरत को लेकर बोलता रहा है कि अगर इन्हीं देशों की चलती रही तो संस्था अपनी लेजिटिमेसी खो देगी। सबको पता है कि अमेरिका अपने हिसाब से चलता है तो चीन किसी की सुनता नहीं। ऐसे में छोटे देश भी वही रास्ता अपनाएँगे, और ये एक ख़तरनाक स्थिति पैदा कर सकती है।

बहरहाल, ब्रिटेन के लिए ये स्थिति थी कि वो ‘ओपन बैलेट’ का सहारा ले। ओपन बैलेट का मतलब था कि वैश्विक पटल पर बार-बार ‘भारत हमारा मित्र है’ का राग अलापने वाले अमेरिका, फ्रांस, और रूस को भारत के विरोध में दिखना पड़ता जो कि उनके हित में नहीं होता। क्योंकि भारत के साथ उनके कई व्यापारिक और रक्षा-संबंधी समझौते हो रहे हैं। अगर ये हो जाता तो इंग्लैंड के लिए ये बहुत ही शर्मनाक बात होती कि उनके हमेशा के मित्र आज उनके विपक्ष में हैं।

फिर आज ये हुआ कि ब्रिटेन में ग्रीनवुड के नाम को वापस ले लिया। ज़ाहिर है कि हारने से बेहतर यही रास्ता था, और बाकी के मित्र राष्ट्र के सामने भी चुनने की बात सामने नहीं आई। अंततः, सैयद अकबरुद्दीन और भारत के विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री आदि के अथक प्रयासों से यूएन में ये एक बड़ी जीत मानी जा रही है।

अब आपको वो लोग मिलेंगे जो ये कहेंगे कि लोगों को देश में पानी नहीं मिल रहा, सड़कों पर गड्ढे हैं, लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं और आपको यूएन में जज मिल जाने की ख़ुशी हो रही है! ये वही लोग हैं जिन्हें ये ही नहीं पता कि यूएन में जज की सीट मिल जाने ये न तो भूखमरी शुरू होती है, न ही ख़त्म। दोनों अलग-अलग समस्याएँ हैं। जैसे कि आम के पेड़ पर फल न लगने की समस्या इमली के जड़ में कीड़े की दवाई डालने से नहीं सुलझती, वैसे ही हर मुद्दे का समाधान उसी मुद्दे के हिसाब से होता है।

यही वो लोग हैं जो ये भी पूछते हैं कि मोदी की विदेश यात्राओं से क्या लाभ हुआ। और यही वो लोग हैं जो मूडीज़ के रेटिंग पर, वर्ल्ड बैंक के स्टेटमेण्ट पर, यूएन की इस जीत पर सवाल उठाते हुए ये कहते पाए जाएँगे कि लोग तो भूख से मर रहे हैं, रेटिंग से क्या होता है।

तो इन चिरकुटों पर ध्यान मत दीजिए। इन्हें ये ही नहीं पता कि विरोध के लिए तर्क क्या दें। इन्हें ये ही नहीं पता कि देश में हज़ार समस्याएँ हैं, और रहेंगी, और सबके लिए सरकारें अलग-अलग स्तर के समाधानों पर कार्य करेगी, न कि इनका एक दूसरे से संबंधित होना ज़रूरी है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *