अंधा कानून लुच्चा हो जाता है; सरकारों में नेता होते हैं, और नेता एक ही ब्रीड के होते हैं

 

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सीबीआई अदालत ने राजा जी और कनिमोई को टूजी घोटाले से बरी कर दिया है। कॉन्ग्रेस खुश है कि ‘सत्य का लहसुन हो सकता है, लेकिन वो पराजित नहीं होता’। दुःखी भी है कि इसी आधार पर सरकार गिर गई उनकी। और ‘आधार’ पर मोदी ने सरकार बना ली। कॉन्ग्रेस के तर्क से चलें तो सबसे निचली अदालत से बरी होना, पवित्र हो जाना है, बाकी की अदालतों का कोई खास मतलब नहीं होता।

मेरा एक दोस्त है। सरकारी नौकरी करता है। मैं उसका मजाक उड़ाता हूँ जब वो कहता है बहुत काम है। पूरा देश सरकारी नौकरों का मजाक उड़ाता है। लेकिन बैठकर पूछने पर बताता है कि काम इतना धीरे क्यों होता है, या होता ही क्यों नहीं। मंत्री समेत सारे जन प्रतिनिधि जिन्हें संविधान सबसे ऊपर रखती है, वो तंत्र को अपने हिसाब से चलाते हैं। हस्ताक्षर अफ़सरों के होते हैं, डील नेता करते हैं, जेल अंततः वो जाता है जिसका सिग्नेचर फ़ाइल पर होता है।

ऐसी स्थिति में कोई भी सरकारी कर्मचारी कोई भी ऐसा काम क्यों करेगा जिसके प्रोसेस के अगले स्टेप्स पर कौन कितना पैसा खा जाय पता न चले? जब वो साइन नहीं करेगा, तो उसका तबादला होगा। वो वहाँ भी साइन नहीं करेगा। जो साइन करेंगे, वो मिले होते हैं। उनको मिलाना पड़ता है। तंत्र उनको अपने हिसाब का बनाने में समय लेता है। और फिर, इतने समय में काम नहीं हो पाता।

नेता लोग इसी बात का फ़ायदा उठाते हैं। फोन कॉल का कोई मतलब नहीं है, लेकिन सारे काम अनकहे रूप से कह देने से ही होते हैं। ‘मंत्री जी ने कहा है’ से लेकर, ‘नेता जी के खास हैं’ तक एक ही तंत्र चलता है। आप कहिए कि मंत्री जी को कहो लिखकर दें। अगले महीने की तीन तारीख़ को आप अंडमान निकोबार पर कौए के अंडे गिनते पाए जाएँगे।

सरकारों को पता है कि सरकारें परमानेंट नहीं हैं। आज हैं, कल नहीं, परसों फिर हैं। मोदी को पता है भारत कॉन्ग्रेस मुक्त नहीं होगा। घोटालों में इसी कारण से अंधा कानून लुच्चा भी नज़र आने लगता है। कोई भी देश किसी भी पार्टी से मुक्त नहीं हो पाती। इसी कारण से गोधरा में मोदी के खिलाफ सबूत नहीं मिलते और तमाम दंगों में कॉन्ग्रेस के खिलाफ।

यही पीठ खुजलाने वाली बात आपको घोटालों के केस में दिखती है। दो दिन से संसद नहीं चल रही कि मोदी मनमोहन से माफ़ी माँगें। अगले दिन तस्वीर आती है दोनों मुस्कुरा रहे हैं, नमस्ते कहते हुए। जनता पागल हो रही है कि टूजी का वर्डिक्ट क्या आ गया!

आधे से ज्यादा को न तो पता है कि किस कोर्ट ने दिया है, न ही उनको मतलब है। मैंने भी कोर्ट के नाम पर सुबह में मज़ा ले लिया। जज ने वकीलों से कहा कि केस का क्या बना दिए हो? सरकार के वक़ील ये साबित नहीं कर पाए कि किसी को फ़ायदा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कारण से आवंटन रद्द कर दिए थे।

सरकार कॉन्ग्रेस-मुक्त भी करना चाह रही है, और मोदी जी करूणानिधि को ‘तैनूँ काळा चश्मा जँचदा ऐ’ भी कहते नज़र आ जाते हैं। मुझसे सवाल पूछा जाता है कि येदुरप्पा पर आपने क्यों नहीं बोला। मुझे याद भी नहीं कि वो कब हुआ था। ये बात अलग है कि जब हुआ होगा, तो मैंने ज़रूर लिखा होगा। अगर नहीं लिखा, तो अब लिख रहा हूँ कि ये सब एक ही ब्रीड के हैं।

सीबीआई तोता है कि मैना इस पर भी एक बहस हो सकती है। सरकारों को पता चल जाता है कि अगली सरकार किसकी होगी। इस देश में हर साल पाँच सरकारें बनती हैं। उसमें अमित भाई शाह की चाणक्यनीति के साथ-साथ परमुटेशन-कॉम्बिनेशन भी लगता है। जोड़-घटाव होता है। इस जोड़ घटाव के हिसाब से सरकारों के वक़ील अवगत होते हैं।

साथ ही, सरकारों के वक़ील पार्टी के सदस्य भी होते हैं। वक़ील कभी कानून मंत्री बन जाते हैं, तो तभी वित्त मंत्री। वकीलों ने ही संविधान लिखा है। और संविधान में ये लिखा है कि वक़ील नेता बन सकता है, और नेता वक़ील। नहीं समझ में आ रहा तो वर्तमान में कपिल सिब्बल और चिदम्बरम को देख लीजिए, और भूतकाल में अरूण जेटली और रविशंकर प्रसाद को।

कथा समाप्त हुई। चिल मारिए।….

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