कर्णाटक चुनाव: जब अनैतिक लोग नैतिकता की आशा करने लगें तो समझो ग़ज़ल हुई

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यह बात कोई नई नहीं है कि राजनीति में हर पार्टी में, हर राज्यों में, हर ज़िले और हर पंचायत में बाहुबलियों, भ्रष्टाचारियों, पैसे वालों या वैसे लोगों का प्रतिशत ज़्यादा है जो समाजसेवी तो बिलकुल नहीं हैं। हर चुनाव के बाद, चुनाव के दौरान और उससे पहले तरह-तरह की बातें सुनने में आती हैं, जिसमें भ्रष्टाचारियों को टिकट देने से लेकर, उनके साथ खड़े होने, उनका समर्थन लेने या उनको मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री तक बना देने की बातें आम होती हैं।

हर चुनाव में छिटपुट हिंसा भी होती है। कई जगहों पर विरोधियों को धमकाने से लेकर गोली मार देने तक की बातें आम रही हैं, और आज भी आम हैं। कई जगहों पर किसी एक पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए तरह-तरह के तिकड़म भिड़ाए जाते रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यहाँ स्थिति आदर्श नहीं है। कोई भी अगर ये क्लेम करता हो कि उसके द्वारा समर्थित पार्टी पाक-साफ़ है तो वो या तो भोला है या धूर्त। 

इसलिए जब मैं इस तरह की चर्चा का हिस्सा बनता हूँ, तो मैं किसी भी सूरत में आदर्शों की बात करने से बचता हूँ। ‘आदर्शों की बात’ का मतलब यह है कि हम वर्तमान परिस्थिति की तुलना किसी भी दूसरी वर्तमान या तुरंत बीते कल की परिस्थिति की बजाय उस स्थिति से करने लगते हैं जहाँ हमें ‘ऐसा होना चाहिए’ वाला भविष्य दिखता है। 

भविष्य वर्तमान और भूत से जुड़ा होता है, उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं है। आपका भूत आपका वर्तमान बनाता है, और वर्तमान में चल रही बात भविष्य को तय करती है। इसलिए वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की तुलना ऐसे परिदृश्य से करना जो कभी न हुआ, न ही आज के हिसाब से होती दिखती है, बेमानी है। जब हम बात करें तो ज़मीनी हक़ीक़त को नकारना ये बताता है कि हम तर्क से परे एक वैसे आदर्शवाद की तरफ़ झुक रहे हैं जो हमारी पहुँच से बाहर है। 

तो क्या हम बेहतरी की बात बंद कर दें? बिलकुल नहीं। चर्चा का विषय अगर कर्णाटक चुनावों के बाद सरकार बनाने की बात है तो वहाँ आप ये बात मत कीजिए कि इसके सारे विधायक गरीब होने चाहिए, किसी पर भी कोई पुलिस केस न हो, और अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा को नैतिक आधार पर सरकार नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि जब आप ऐसा कुतर्क करते हैं तो आप एक बेहतर विकल्प नहीं दिखा पाते। इससे बस यही पता चलता है कि आपको इससे मतलब नहीं है कि क्या हो रहा है, या क्या हो सकता है बल्कि आपको इससे मतलब है कि ये पार्टी मेरी विचारधारा के साथ नहीं है तो इसकी सरकार न बनें। तब, आपको ये भी स्वीकार्य हो जाता है कि कॉन्ग्रेस-जेडीएस सरकार बना ले।

जहाँ चर्चा का विषय यह हो कि ‘भारतीय राजनीति की गंदगी कैसे मिटाई जा सकती है’, वहाँ आपको आदर्शवादी होने पर तार्किक कहा जाएगा। वहाँ हम एक ऐसे तंत्र की बात कर सकते हैं जहाँ किसी पर एक छोटा केस हो, या उसके पास इतनी से ज़्यादा संपत्ति हो, या उसका एक भी आदमी राजनीति में हो आदि तो वो चुनाव नहीं लड़ सकता। वहाँ आप खूब खुलकर अपनी बातें रख सकते हैं क्योंकि वो हमारी सोच के दायरे को बताता है। वहाँ आप एक आशा कर रहे हैं कि क्या होना चाहिए।

अब इस चुनाव और उसके बाद की बात करते हैं। लोग भाजपा को अनैतिक, ‘लोकतंत्र की हत्या’ करने वाला, संविधान विनाशक, सुप्रीम कोर्ट को जेब में रखने वाला और पता नहीं क्या-क्या कह रहे हैं। ये जो कह रहे हैं, उनका विवेक कैसा है ये हम सब जानते हैं। लेकिन अगर भाजपा यहाँ अनैतिक है, तो फिर नीतिगत बातों और आदर्शों पर कौन सही उतर रहा है? कॉन्ग्रेस? जेडीएस? 

कॉन्ग्रेस और जेडीएस दोनों ने एक दूसरे पर लगातार आरोप लगाते हुए अपनी सीटें जीतीं। विचारधारा के स्तर पर दोनों विपरीत खेमे में हैं। अगर किसी सरकार को जनता नकार कर दूसरे स्थान पर भेज देती है तो फिर उसे ये नैतिक हक़ कहाँ से मिलता है कि वो और भी नकारी हुई पार्टी, जो उसी को गरियाकर चालीस सीट जीत पाई हो, को समर्थन दे दे? ये संविधान की किस किताब के अनुसार लोकतंत्र की रखवाली है? 

जब आप ये तर्क देने लगते हैं कि उनके पास 63% वोट शेयर है, और ‘गठबंधन’ के पास 117 सीटों हैं जो बहुमत के लिए सटीक हैं, तो आप महज़ कुतर्क के कुछ भी नहीं कर रहे। क्या सीटों पर जीत इस बात से तय होती है कि किस पार्टी को कितना वोट शेयर मिला है? क्या इस बात का प्रावधान है कि चुनाव जीतने के बाद जनता विधायकों से पूछे कि हमने तो तुम्हें अपनी विरोधी विचारधारा वाली पार्टी को हराने के लिए वोट दिया था, तो अब कैसे मिल गए उससे? क्या ये करना नैतिक है? 

फिर बात आती है राज्यपाल की। राज्यपाल के सामने ये निर्णय विवेक का होता है कि वो किसे आमंत्रित करे। इसमें भी अगर कोई पार्टी बहुमत साबित करने की स्थिति में हो, तो उसे मौक़ा दिया जाता है। ये हुआ है, कई पार्टियों ने ऐसा किया है। किसी का पहले से ही गठबंधन हो तो उस स्थिति में वो बहुमत में माने जाते हैं, तो उनको न्योता मिलता है सरकार बनाने का। लेकिन राज्यपाल इस बात को भी देखता है कि गठबंधन सिर्फ संख्याबल पर न हो, बल्कि गठबंधन की विचारधारा भी समान हो। आप इन दोनों पार्टियों का मेनिफेस्टो देख लीजिए, समझ में आ जाएगा।

ये तो हुई नैतिकता की बात। अब आती है बात कि क्या राज्यपाल केन्द्र की कठपुतली होती है? जी, होती है, और बिलकुल होती है। ये बात भी कोई नई नहीं है, ये हर दशक में, हर केन्द्र सरकार ने मनमाने तरीक़े से अपनाया है। राज्यपाल नियमों के दायरे में रहकर निर्णय लेने को स्वतंत्र है। चूँकि उसे संवैधानिक दायरे में कार्य करने की छूट है, और उसमें नैतिकता एक मापदंड नहीं है, तो इसको कोर्ट में भी साबित नहीं किया जा सकता। 

बात घूम-फिरकर यहीं आती है कि फ़्लोर टेस्ट में अगर भाजपा हार जाती है तो फिर दूसरी पार्टी को राज्यपाल मौक़ा देता है। इस स्थिति के बाद बारहवीं पास करके, तीन-चार साल में नए ग्रेजुएट हुए आदर्शवादी छात्र और धूर्त पत्रकारों, ओपिनियन मेकर्स की मंडली अब ये कहती पाई जा रही है कि भाजपा ने संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया है। 

हालाँकि, ये बात भी तय है कि इनको कहीं की राजनीति, समाज सुधार, विकास या सरकारी योजनाओं से कोई भी, कोई भी, मतलब नहीं है। इनकी एक विचारधारा है, या वो भी नहीं है, जिसके तहत इनको अपनी पहचान, दस-बीस लाइक, दो-चार ‘वाह अजीत जी, क्या बात कही है’ सुनने की इच्छा रहती है। इसलिए ये लोग हमेशा आपको एक ही तरह की बात करते दिखेंगे जिसमें भाजपा न तो सड़कें बना रही, न ही ग्रोथरेट सही हो रहा, न ही जीएसटी से टैक्स कलेक्शन बढ़ा है, न ही बिजली कहीं पहुँची है, न ही मंत्रालयों की कार्यप्रणाली में सुधार हुआ है, न ही किसानों के लिए कोई इनिसिएटिव लिए गए हैं, न ही आतंरिक और बाह्य सुरक्षा के क्षेत्र में कुछ हुआ है… 

इनके हिसाब से देश में कुछ भी नहीं हुआ है। जब इनके दिमाग में यही चल रहा है तो आख़िर वो ये सब क्यों नहीं लिखेंगे कि भाजपा को कर्णाटक ने नकार दिया है। इनके कहने का मतलब यह है कि दो असफल छात्रों के नंबर जोड़कर एक कर लिए जाने पर वो उस छात्र से ज़्यादा विषय की समझ बना लेंगे जो उन दोनों के नंबर जोड़ने के बाद पाँच नंबर कम पाया हो। 

इसके बाद एक गिरोह आता है उन चिरकुटों का जो बस दिन रात हर बात पर हल्ला करते हैं। हल्ला करने के लिए इनके पास जो तर्क होता है वो फिर से घूम-फिरकर उसी बात पर अटक जाता है कि भाजपा ने तो कहा था कि वो एक अलग पार्टी है। ये भी आदर्शवादी बात है। भाजपा की बात अभी आप मान रहे हैं लेकिन वही जब कहेगी कि फ़लाँ पार्टी भ्रष्ट है तो आप नहीं मानेंगे। आपको भाजपा से ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ की पूरी उम्मीद रहती है क्योंकि मोदी ने रैली में बोला था, लेकिन आप टूजी घोटाले में सबसे निचली अदालत द्वारा एक छूट देने से दूसरी पार्टी को ईमानदार मान लेते हैं। जैसे कि आपको ये पता नहीं कि न्यायिक प्रक्रिया कितने स्तर की है इस देश में। 

चूँकि राहुल गाँधी या सोनिया ने ये कहीं नहीं कहा कि ‘न खाऊँगा’ तो मतलब ये हो जाता है कि इनकी पार्टी ने कभी घोटाला किया ही नहीं। चूँकि एक पार्टी कहती है कि वो नैतिकता की राह पर चलेगी, और दूसरी पार्टियाँ ऐसा कोई क्लेम नहीं करती तो आपको उस पार्टी से ही नैतिकता चाहिए। आपके कुतर्क की इंतहा तो यही है कि आप कहने लगते हैं कि कॉन्ग्रेस ने कब कहा था कि वो नैतिकता की राह पर चलेंगे! 

सुनिए अपने वाहियात तर्कों को। नैतिकता, साफ़ राजनीति, आदर्श समाज और ईमानदार नेताओं के होने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ भाजपा या मोदी की नहीं है। अगर आपकी माँग है कि ऐसा हो, तो वो माँग हर पार्टी और हर नेता के साथ आप पर भी एक नागरिक के तौर पर लागू होती है। आप खुद टैक्स नहीं भरते और भारत की गिरती अर्थव्यवस्था पर सरकारों को कोसते हैं तो दोगले हैं आप। जब आपको इस बात पर घेरा जाएगा तो आप ये गिनाने लगेंगे कि सड़कें टूटी हुई हैं, बिजली चली जाती है, कुत्ता काट लेता है और पता नहीं क्या-क्या! 

मैं राजनीति में नैतिकता की बात नहीं करता। सही क्या है, गलत क्या है, इससे मुझे एक राजनैतिक विश्लेषण करते हुए फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि कोई भी उस लायक नहीं है कि इस ज़मीन पर बात की जा सके। आपको दो ग्लास में रखे जूस की बात करनी है, और दोनों ही ग्लास लाल रंग का है, दोनों ही जूस पीले रंग के आम के हैं, तो फिर ग्लास के रंग और आम के रंग पर बात नहीं होगी। बात इस पर होगी कि आम किस प्रजाति का है, जूस में चीनी कम है या ज़्यादा। 

यहाँ पर लोग इस बात पर झगड़ रहे हैं कि ग्लास नीले रंग का क्यों नहीं है क्योंकि हमारे झंडे का चक्र नीले रंग का है, हमारी क्रिकेट टीम की शर्ट का रंग नीला है! ये तर्क दो मिनट नहीं चलने वाला क्योंकि वस्तुस्थिति यह है कि ग्लास लाल रंग का ही है, और पीने वाले को इसी दो ग्लास में से एक को पीना है। उसके पास ये चुनने का विकल्प नहीं है कि वो नीले रंग के ग्लास में जूस डालकर पी ले। तो पीने के बाद वो यह नहीं कहेगा कि लाल रंग वाले ग्लास का जूस ज़्यादा मीठा है, बल्कि ये कहेगा कि मालदह आम वाला जूस उसे बेहतर लगा, वो वही चुनना चाहेगा। 

अब तंत्र की सीमाओं को समझिए। हमारे देश में नेता ही कानून बनाते हैं, संशोधन करते हैं और अंततः उन्हीं की बात न्यायपालिका से भी ऊपर रहती है। इस हिसाब से एक कानून बनता है कि जिन पर अपराध ‘साबित’ हो जाएगा, वो चुनाव में भाग नहीं ले सकते। अपराध ‘साबित’ होने में दशकों बीत जाते हैं, अगर आपके पास संसाधन हैं। फिर भी, अगर आप चोर हैं, और चुनाव नहीं लड़ सकते तो भी आपके पुत्र, आपकी पुत्री, आपके भाई, आपकी पत्नी, आपके संबंधी चुनाव लड़ सकते हैं और आपके नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं।

यहाँ पर संविधान उन्हें एक स्वतंत्र नागरिक और उसके बुनियादी अधिकारों के आधार पर चोर के बेटे को चुनाव लड़ने की आज़ादी देता है। क्योंकि उसका बाप चोर है, इसका मतलब यह नहीं माना जा सकता कि वो उस चोरी का भागीदार था। हमारा तंत्र इसी तरह काम करता है। इसीलिए आप फ़ेसबुक पर खुद टैक्स चोरी करने वाले लोगों की वाल पर ये लिखा देख लेते हैं कि रेड्डी बंधुओं के संबंधियों को भाजपा ने टिकट क्यों दे दिया? 

अरे भाई, ऐसा करना असंवैधानिक नहीं है। इसीलिए सिद्धारमैया हों या येदियुरप्पा, आप लाख चिल्लाते रहें कि वो चोर है, कोर्ट के फ़ैसले आने तक वो मुख्यमंत्री बनते रहेंगे। आरोप लगने का मतलब अपराधी साबित होना नहीं हो जाता। इसीलिए यूपीए काल के घोटाले अभी तक साबित नहीं हुए और जिन्हें आप चोर मानकर चिल्लाते रहते हैं, वो चुनाव लड़ रहे हैं। एडीआर की रिपोर्ट में खूब आता है कि इतने नेताओं पर ये गम्भीर आरोप हैं, ये अतिगम्भीर आरोप हैं, ये छोटी हिंसा के आरोप हैं, और सबको टिकट मिल गया है।

टिकट मिल सकता है क्योंकि हमारी न्यायिक प्रक्रिया आरोप लगने को अपराध नहीं मानती। और इसपर यह कानून भी वो ही बनाएँगे जिसमें किसी के घर में एक चोर होने पर बाकी लोगों को चुनाव लड़ने पर रोक हो। आप भी जानते हैं कि ये कानून कभी नहीं बनेगा। उसका सीधा कारण यह है कि बाप के चोर होने का ये मतलब नहीं होता कि बेटा क़ातिल निकलेगा। यहाँ नागरिक स्वतंत्र होते हैं, और सबको समान अधिकार हैं। 

इसलिए, जब कोई किसी एक पार्टी के ‘दाग़ी’ लोगों को टिकट देने का आरोप लगाकर गला फाड़ने लगता है तो उसको चुपचाप समझाइए कि कौन सी ऐसी पार्टी है जहाँ तथाकथित दाग़ी लोग नहीं हैं। उससे चुपचाप पूछिए कि क्या हमारा कोर्ट ‘दाग़ी’ होने को अपराधी मानता है? उससे पूछिए कि उसके पिता का नाम, अगर उसका पड़ोसी आपके बग़ल के घर की औरत के ज़िंदा जलकर मरने पर, थाने में दे दे तो क्या उसके पिता अपराधी हो जाएँगे या फिर वो तब ये चिल्लाता फिरेगा कि आरोप लगने का मतलब अपराध साबित होना नहीं होता? फिर उसका उबाल ठंढा पड़ जाएगा। 

मैं खुद नैतिक नहीं हूँ। मैं जिस समाज में हूँ वो नैतिक नहीं है। मेरे दोस्त आदर्श नहीं हैं। मैं जिस मुखिया को चुनता हूँ वो निरपराध नहीं है। मेरे ज़िले का सांसद सही आदमी नहीं है। फिर मैं किस आधार पर कर्णाटक के चुनावों में जिस पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिली, उसके सरकार बनाने को ग़लत मान लूँ? क्या कॉन्ग्रेस और जेडीएस फिर से चुनाव हों तो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम लेकर जनता से वोट माँगने जाएगी? 

जो लोग छाती कूट कर नैतिकता की चूड़ियाँ तोड़ रहे हैं, उनकी चूड़ियाँ भी उधार की हैं। नैतिकता की दुहाई का आधार सिर्फ़ एक पार्टी से आदर्शों की अपेक्षा नहीं हो सकता, आपको तीनों पार्टियों को साथ रखकर देखना होगा। यहाँ, या तो फिर से चुनाव हो, या फिर जिसने चुनाव के पहले जो बातें की थी, उसी पर टिके रहकर सरकार बनाने का दावा पेश किया हो तो उसे बहुमत सिद्ध करने का मौक़ा मिले। 

आप जो माँग रहे हैं वो धूर्तता है। आपकी बेचैनी दिखती है क्योंकि आप जिस विचारधारा को पालते रहे हैं, उसकी सारी मक्कारी जनता पकड़ रही है। आपकी मक्कारी हमारे जैसे लोग पकड़ रहे हैं क्योंकि आपको विकास या आदर्श से कोई लेना-देना नहीं है। आप कार के पीछे भागते गली के वो कुत्ते हैं जिसे ये भी नहीं पता कि उसे कार से उतरकर आदमी पूछ ले कि क्यों भौंक रहा है तो वो क्या जवाब देगा। और तो और, उसे दो बार पुचकारकर बिस्किट फेंक देगा तो वो कार में बैठकर पैर चाटता उसके घर पहुँच जाएगा। 

मोदी और भाजपा अंधविरोधी इन्हीं कुत्तों की जमात से आते हैं। वैसे मुझे कुत्तों से बहुत प्रेम है लेकिन जो आदमी के रूप में कुत्तों की तरह बेवजह भौंकता है, क्योंकि उसे भौंकना ही आता है, तो वहाँ समस्या है। ये अंधविरोधी वही लोग हैं जिनका तर्क से कोई वास्ता नहीं। 

इसलिए इन लोगों से कुछ सीधे सवाल पूछिए: १. तीनों पार्टियों में कौन-सी पार्टी नैतिक और आदर्श है; २. किस पार्टी ने इतिहास में नैतिकता और आदर्श के कीर्तिमान स्थापित किए हैं; ३. किसी पार्टी को गरियाकर वोट लेना और बाद में उसके साथ पद के लोभ में सत्ता हथियाने की कोशिश करना क्या जनता की पीठ में छूरा घोंपना नहीं है? 

जवाब नहीं मिलेगा। तब ये लोग ‘इतिहास’ में किसने क्या किया की दुहाई देकर लिंक फेंकने लगेंगे। तब तो आप ये बात भी जानते हैं कि लिंक निकालने में आप और हम भी पीछे नहीं हटेंगे। एक लिंक उनका दस आपका, बोलती बंद हो जाएगी क्योंकि लोकतंत्र की हत्या हो न हो, इन दोनों पार्टियों ने कम चाकू नहीं घोंपे हैं संविधान में। 

तब ये लोग मोदी के बयानों की दुहाई देंगे कि आपने तो कहा था कि आप स्वच्छ राजनीति करते हैं। तो फिर उनसे पूछिए कि कौन-सा नया विधायक एक अपराधी है? उनसे पूछिए कि किसे वो भ्रष्ट कह रहे हैं और उसे वैसा कहने को पीछे तर्क क्या हैं? क्या उसी तर्क पर बाकी सारे विधायक/पार्टियाँ सही हैं? 

आप देखेंगे कि चिरकुटों की भीड़ वापस वहीं शरण लेने लगेगी जहाँ से बात शुरु हुई थी: भाजपा ने तो कहा था कि वो पार्टी विद डिफरेंस है। फिर आप भी वही पूछिए आख़िर ऐसा क्या कर दिया है जो असंवैधानिक है, और अगर ऐसा है तो सुप्रीम कोर्ट या फिर फ़्लोर टेस्ट में पता चल जाएगा। तब तक चिल मारिए और ऐसे लोगों को पूछिए, “कार में बैठोगे?” देखिएगा वो पैर चाटने लगेंगे। इनकी यही प्रकृति है। 

One thought on “कर्णाटक चुनाव: जब अनैतिक लोग नैतिकता की आशा करने लगें तो समझो ग़ज़ल हुई

  1. वाक़ई! बौद्धिक डायरिया और प्रतिभाजपाई विचाराधरा वाले ये लोग कुत्ते ही है जिन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ बेवज़ह भौंकना भाता है। विश्वविद्यालयों और शीर्षस्थ सरकारी संस्थाओं के उच्च पदों पर बैठने वाले ये लोग आज़कल बेरोजगार हो गए है। यो बस एक सूत्रीय कार्यक्रम के तहत भाजपा को गरियाते फ़िरते है। वर्तमान कर्नाटक चुनाव की एक-एक तह खोलता ये शानदार लेख है।☺☺☺

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