लुटेरों, बलात्कारियों, आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग कब तक होती रहेगी?

बिग बीसी की एक ख़बर के अनुसार अलाउद्दीन ख़िलजी भारत के सबसे प्रबुद्ध शासकों में से एक था। शोध का हवाला अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास के प्रोफ़ेसर का दिया गया है।

अब जबकि औरंगज़ेब से लेकर जितने भी लुटेरे, बलात्कारी और हत्यारों की भीड़ यहाँ पर आई, बसी, और वंश को बढ़ाया, उन सबके रहमदिल, करूणानिधि और सेकुलर भारत की नींव रखने वाला बताए जाने पर भी कई शोधपत्र मौजूद हैं, मुझे आश्चर्य होता है कि आख़िर भारत के हिन्दू लोग, इन सब ‘महान’ शासकों के आने से पहले कैसे रहते होंगे! क्योंकि बाज़ार को नियंत्रित करने से लेकर, सड़क और घर बनाने की तकनीक, सारी व्यवस्थाएँ तो इस्लामी हमलावरों ने हमें दी!

बाकी की कमी महान अंग्रेज़ बहादुर के राज में पूरी हो गई। फिर ये गाँधी-नेहरू, आज़ाद-भगत सब पागल ही रहे होंगे कि ऐसे महान शासनतंत्र से मुक्ति का संघर्ष करते रहे! हमलोग एक निकम्मी, मूर्ख, कायर और अव्यवस्थित जनसंख्या थे, जिन्हें महान बलात्कारियों, लुटेरों, और हत्यारों तक ने जीने का तरीक़ा सिखाया। यही तो कारण है कि ग़ुलामी का हर एक प्रतीक हमारे लिए पर्यटन स्थल है।

लोग ये तर्क देने से नहीं हिचकिचाते कि अंग्रेज़ों ने ये दिया, वो दिया… अरे भाई! किसने बुलाया था उन्हें हमारा कल्याण करने के लिए? लूटने के लिए बिछाई रेल की पटरियाँ और पुल, टेलीफ़ोन और बेतार, सारी तकनीकें जिनका गुणगान हो रहा है। हम पर तरीक़े से कोड़े बरसाए जा सकें, हमारे पेड़ों की लकड़ियाँ लंदन के घरों के निर्माण में काम आ सके, और हमारे समाज में नफ़रत के कई बीज बोए जा सकें, बस इसके लिए ही रेल, सड़क, डाक, कारख़ाने और हर वो चीज बनी जिसके लिए हमारे बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा उनके गुणगान करते नहीं थकता।

इंडिया गेट, संसद भवन, पूरी लुटयन दिल्ली हमारी ग़ुलामी का प्रतीक है जिसे हम हर दिन देखते हैं, और दुर्भाग्यपूर्ण तरीक़े से गर्व भी महसूस करते हैं! कारण? अरे, इन्हें गिराने का क्या फ़ायदा? हमें, सबकॉन्टिनेंट वालों को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो ग़ुलामी को याद करके आह्लादित होता रहता है।

फिर आते हैं मुग़लों पर कि उन्होंने तो कुछ लूटा नहीं, वो तो यहीं रह गए! वाह! मैं तुम्हारे घर में आता हूँ, तुम्हारी बहन-बेटियों का बलात्कार करता हूँ, घर के ख़ज़ाने लूट लेता हूँ, और फिर मैं गाँव का मुखिया बनकर तुम्हें ये बताता हूँ कि गाँव में व्यवस्था ऐसे चलनी चाहिए। और तुम्हारे पोते इस बात पर खुश होते हैं कि हमारे दादा तो मूर्ख और गँवार थे, आपके दादा आए तो तमीज सिखाई।

जो लोग ये दलीलें देते हैं कि उन्हीं अंग्रेज़ों और मुग़लों के कारण हम आज इस (सकारात्मक) स्थिति में हैं, वो ये भूल जाते हैं इसे साबित करने के लिए कोई तर्क नहीं है कि अगर वो नहीं आते तो हम भूखे मर रहे होते। कौन ऐसा आदमी है जो ये जानकर खुश होगा कि उसके कमरे में आज एक ट्यूब लाइट जलती है क्योंकि उसकी दादी का बलात्कार बाहर के उस आदमी ने किया जिसका चाचा बिजली का आविष्कारक था?

ये कौन सी बेहूदी दलील है कि किसी ख़िलजी ने बाज़ार में चीज़ों के दाम नियंत्रित किए और वो भारत के प्रबुद्ध शासकों में से एक था? नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की लगभग एक लाख पांडुलिपियों ने खुद ही आग लगा ली होगी? या ऐसा करना बख्तियार के लिए जरूरी रहा होगा?

किसी भी सभ्यता को तोड़ने का सबसे आसान तरीक़ा होता है उसके इतिहास और साहित्य को नष्ट करना। मुसलमान आतंकी शासकों ने जो कार्य इतिहास को जलाने से शुरु किया था, उसी को अंग्रेज़ों में पूरी तरह से विलियम जोन्स जैसे चिरकुट इतिहासकार के नेतृत्व में बदलने तक जारी रखा। बाकी का काम मैक्समूलर जैसे लोगों ने पूरा किया जिनका गुणगान आज भी होता रहता है।

ये सामान्य बुद्धि और विवेक की बात है ये सोचना मूर्खता है कि हमारे यहाँ बाज़ार में मूल्यों का नियंत्रण नहीं था, या डाकसेवा नहीं थी, या पुल नहीं थे, तो यहाँ के लोग समृद्ध नहीं थे। यहाँ के लोग बेहतर स्थिति में जी रहे थे, और शायद आज भी, अगर ये हमले न हुए होते तो, बेहतर स्थिति में जीते होते। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि बिना बलात्कार करवाए कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन इसकी प्रोबेबिलिटी ज्यादा है कि बिना बलात्कार कराए आदमी की सामाजिक स्थिति बेहतर रहती है।

किसने निमंत्रण पत्र भेजा था कि आइए और हमारे समाज को सुधार दीजिए? क्या ऐसा कोई रिकॉर्ड है, जो कि नहीं है क्योंकि ख़िलजी और बाकी लोगों ने उसे जला दिया, जो बताता है कि भारत में मुग़लों और अंग्रेजों के पहले भुखमरी थी, लोग भटक रहे थे, उन्होंने उन्हें ख़त भेजा था कि आइए, हमलोग दिक्कत में हैं। न ही ये सबूत मिले हैं कि मुग़ल काल में भारत के तब के बुद्धिजीवी लोग असहाय होकर ब्रिटिश पार्लियामेंट को सिग्नेचर कैम्पेन चलाकर बुलाया था कि हमारे पास बहुत पैसा है, आइए और लूटकर ले जाइए।

आखिर मुग़ल सल्तनत को इतने चाव से क्यों पढ़ा और पढ़ाया जाता है कि नवीं-दसवीं कक्षा में उनके ऊपर पूरे चैप्टर हैं, और मौर्य, गुप्त, चोल, पांड्य, चेर जैसे शासकों को एक साथ ही एक-एक पैराग्राफ़ में ख़त्म कर दिया जाता है? हम आख़िर विश्वयुद्ध को सिलेबस में क्यों इतने डीटेल में पढ़ते हैं जबकि उसमें भारत का हिस्सा बहुत ही सीमित और नगण्य था?

बात ये है कि शिक्षा व्यवस्था पर इस तरह का शिकंजा कसा हुआ है कि आने वाले समय में ऐसे ही शोध होते रहेंगे और आक्रांताओं को करूणासागर जैसा दिखाया जाएगा। उनके सारे पाप, बलात्कार, नृशंस नरसंहारों को ‘राज्य को चलाने के लिए जरूरी’ कहकर सही ठहरा दिया जाएगा। या फिर सिरे से ख़ारिज कर दिया जाएगा कि ऐसा हुआ ही नहीं, और ये संघियों की चाल है।

आने वाले दिनों में नए शोधार्थी ये बताएँगे कि ‘जाति’, ‘पर्दा’ जैसे शब्द संस्कृत मूल के हैं, और ये सब मुग़लों और अंग्रेज़ों की देन नहीं है बल्कि उन भले लोगों ने तो समाज को इन कुरीतियों से बचाने के प्रयत्न किए थे।

आज के दौर में क्विंट में ये आर्टिकल छप जाता है कि ओसामा एक बहुत अच्छा पिता था, और बीबीसी शोध के ज़रिए बता देता है कि ख़िलजी ने बाज़ार को नियंत्रित करने की प्रणाली भारत को दी। पाकिस्तान में गजनी और गोरी को पूजा जाता है क्योंकि वो मुसलमान थे और हिन्दुओं को रौंदते थे, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार किया था।

वही प्रपंच यहाँ भी चल रहा है। भारत जैसे फ़ाइनल फ़्रंटियर पर, जो न तो ज़ोर ज़बरदस्ती से मुसलमान हो सका न ही ईसाई, वेटिकन अपने फ़ंड और मीडिया, शिक्षातंत्र, थिंकटैंकों आदि के मैनेजमेंट के ज़रिए लगा हुआ है, और इस्लामी देश आतंक के रास्ते से। लगातार कन्वर्जन जारी है। हिन्दुओं का प्रसाद, पर्व, परम्पराएँ, सब रिग्रेसिव, पर्यावरण-विरोधी, अंधविश्वास हैं। जबकि वर्जिन मैरी पुत्र जन देती हैं, बच्चों का बलात्कार करने वाले एचआईवी इन्फैक्टेड पादरी को पवित्र जल छिड़क कर पोप स्वयं माफ़ी देते हैं, और चमत्कारों के दम पर कन्वर्जन का धंधा करने वाली मदर टेरेसा को संत मान लिया जाता है।

अल्लाह के नाम पर पूरी दुनिया में तबाही मचाने वाले सिरफिरे युवाओं को कोई भी इस्लामी आतंकी कहने से कतराता है। क्योंकि वो पोलिटिकली करेक्ट बात नहीं है! लाउडस्पीकर के अजान से शांति भंग नहीं होती, ज़ाकिर नायक जैसे लोग यहाँ सालों से टीवी और इन्टरनेट के ज़रिए आतंकियों की फ़ौज खड़ी करते रहे, हमारी सरकार को पता होकर भी, पता नहीं चला।

ये सब कैसे हो रहा है, उसे समझने के लिए किसी को शोध करने की ज़रूरत नहीं है। ये बस हो रहा है। लगातार क्रूर लोगों को सहनशीलता की मूर्ति बनाकर पेश किया जा रहा है। समय के बीतते हुए एक दिन उनकी प्रतिमाएँ लगेंगी कि ये कितने महान थे जिन्होंने हमें जीने की दिशा दी। कन्वर्जन पर बिल नहीं आएगा, सभागारों में लोग जीसस की सीडी पकड़ते ही झटके खाते हुए नाचते रहेंगे, लव जिहाद पर कोर्ट दाहिने और बाएँ चलती रहेगी।

द वायर, क्विंट, स्क्रॉल, बीबीसी जैसी मीडिया हत्यारों की मेनस्ट्रीमिंग करते रहेंगे। हमारे बुद्धिजीवी उन लेखों को शेयर करते रहेंगे। क्यों? क्योंकि उनकी कंडीशिनिंग इतनी गहरी हो रखी है कि उन्हें इंडिया गेट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन जैसी इमारतों में स्थापत्य कला दिखती है, ग़ुलामी नहीं। क्योंकि हमें पढ़ाया गया है कि हमें कपड़े पहनने से लेकर, अंग्रेज़ी बोलने तक और बर्गर खाने से लेकर से कमोड में मल के रूप में निकालने तक का काम या तो मुसलमान आतंकी शासकों ने सिखाया या अंग्रेज़ों ने।

मुसलमान आतंकी शासकों और अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत के लोग मलद्वार से खाते थे, और मुँह से निकालते थे; खेतों में बैलगाड़ियाँ चलाते थे और रास्तों पर धान बोते थे; एक-दूसरे की बहनों का बलात्कार करते थे और बीवियों को आग में जला दिया करते थे; धोती सर में बाँधते थे और रुमाल से कमर ढकते थे; पढ़ना-लिखना तो आता नहीं था और अंग्रेज़ों ने पहला स्कूल खोला…

हमें इनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हमें हर पचास साल पर एक बार इन्हें बुलाना चाहिए कि आओ अंग्रेज़ बहादुर, आओ मुसलमान आतंकियों के परपोतों, और हमें लूटो, हमारा बलात्कार करो, हमारी हत्याएँ करो और फिर कुछ दिन रहकर हमें सड़क और पुल बनाना सिखाओ, रेल की पटरियाँ बिछाओ, सिक्के और नोट का प्रचलन बताते जाओ, और हाँ, नया इतिहास भी लिखवाते जाओ जिसमें अच्छी बातों को ज़रूर बताना। अगर इतिहास लिखते-लिखते चले गए, तो इतना पैसा देते रहना कि हमारे बुद्धिजीवी तुम्हारा फ्रीलाँस काम करते रहें।

 

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