रवीश कुमार सरीखे लोग स्टूडियो से रैलियाँ करना कब बंद करेंगे?

 

आजकल रवीश कुमार से लेकर सारे वामभक्त मीडिया वाले ‘बैंकों में आपका धन सुरक्षित नहीं है, कभी भी हड़प लेंगे आपका पैसा’ वाला राग अलाप रहे हैं। आपने भी कहीं लिंक देखे होंगे, कहीं प्राइम टाइम।

ये सारी ख़बर गुजरात चुनाव से जोड़कर देखिए कि न तो ये बिल अभी लोकसभा में पास हुआ है, न ही ये हार्डकोर वैसा है ड्राफ़्ट में जैसा हेडलाइन में बताया जा रहा है। हर ख़बर और प्राइम टाइम इसी बात से शुरु हो रही है कि ‘बताया जा रहा है कि ड्राफ़्ट बिल जो फलाने कमेटी के पास जा रही है, उसमें ऐसा है’।

जब बिल किसी कमेटी के पास जा ही रही है अवलोकन और सुधार के लिए तो फिर इस पर कल्पनाशीलता दिखाते हुए, डरावना हेडलाइन और गम्भीर आवाज में झूठ क्यों परोसा जा रहा है? न तो लोकसभा का सेशन शुरु हुआ है, न ही आप स्वयं ये दावा कर सकते हैं कि आपने वो ड्राफ़्ट देखा है, और जो ड्राफ़्ट में है, वो अंत तक रह जाएगा।

वित्त मंत्रालय और मंत्री ने इन दोनों ही तरह के अफ़वाहों का खंडन करते हुए कहा है कि इन ख़बरों में कुछ भी सत्य नहीं है। रवीश कुमार जैसे लोग पत्रकारिता के स्तम्भ बने फिरते हैं, और उनका पूरा प्राइम टाइम किसी असिसटेंट प्रोफ़ेसर द्वारा लिखे किसी आर्टिकल पर आधारित होता है, न कि वो ये कोशिश करते हैं कि वो ड्राफ़्ट खुद पढ़ लें, और वित्त मंत्रालय से कन्फर्म कर लें।

कन्फर्म कर लेंगे तो चालीस मिनट जो डर का माहौल बनाते हैं टीवी पर वो कैसे बनेगा। कैसे गुजरात का वोटर पैनिक करेगा कि ‘बाप रे! हमारा पैसा सुरक्षित नहीं है!’ आम जनता तो ऐसी हेडलाइन पढ़कर ही पागल हो जाती है क्योंकि उसको बिज़नेस और फाइनेन्स की समझ वैसे भी नहीं होती।

रवीश कुमार अपने पूरे प्राइम टाइम के इंट्रो में खूब सारी टट्टी करते हुए नज़र आए और अंतिम पैराग्राफ़ में, जो कि पूरे इंट्रो का एक से दो प्रतिशत रहा होगा, ये चुपके से कह देते हैं कि वित्त मंत्रालय ने कहा है कि उपभोक्ताओं का हित सर्वोपरि है, और ऐसी ख़बर में सच्चाई नहीं है।

किसी अख़बार का एक कॉलम वित्त मंत्रालय के बयान से निन्यानवे गुणा ज्यादा भारी कैसे पड़ जाता है? किस आधार पर चालीस मिनट का प्रोग्राम और हजार-पंद्रह सौ शब्द लम्बे लेख वामपंथी अख़बारों में छप रहे हैं? क्यों न इन्हें कॉन्ग्रेस के समर्थन में स्टूडियो और न्यूज़ रूम से चलती कैम्पेनिंग के तौर पर देखा जाय?

क्यों न ये कहा जाय कि रवीश कुमार स्टूडियो से रैली कर रहे हैं? आखिर जिस ख़बर का आधार एक दूसरी ख़बर होती है, जिसका आधार कल्पनाशीलता है, वैसी ख़बर को इतनी संजीदगी से दिखाने के पीछे क्या उद्देश्य है? और ऐसा क्यों लगता है कि जो बातें ड्राफ़्ट में हैं, वो फ़ाइनल बिल में भी होंगी और उसे सारे सांसद पास कर देंगे?

क्या ये पूरा बिल बस इतने में सिमट कर रहा जाता है कि बैंक के बाहर लाइन में खड़े आदमी को बैंक का मैनेजर कह रहा है कि पैसा नहीं है, दो साल बाद आना? और अगर ऐसा नहीं है तो फिर ये डर का माहौल क्यों बनाया जा रहा है इन तमाम चैनलों और वेबसाइटों द्वारा?

10 अगस्त 2017 को ये बिल लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था और उसके बाद पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमिटी के पास भेज दिया गया है। ख़बरों में जो ‘बेल-इन’ की बात की जा रही है कि किसी भी तरह के ‘रेयर इवेंट ऑफ़ फेल्यर’ में बैंकों के पास इस बात की आज़ादी होगी कि वो डिपोजिटर्स के, यानि हमारे और आपके, पैसों को अपना बिज़नेस बचाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, इसे वित्त मंत्रालय ने न सिर्फ अफ़वाह कहा है, बल्कि ये भी कहा है कि पहले ये ज़्यादा पारदर्शिता के साथ आपके पैसों को बचाना ही सरकार की ज़िम्मेदारी है।

जब बिल अगस्त से ही आपके पास में है, तो चुनाव के दो दिन पहले इसे बिना पढ़े और अपने मन की बातें लिखकर पब्लिक के सामने रखने की क़वायद के पीछे की मंशा क्या है? आपके पास तो चार महीने थे, तब इस ख़बर पर विवेचना और चर्चा क्यों नहीं हुई? आखिर ये मीडिया हिट जॉब नहीं तो फिर क्या है?….

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