फट के फ्लावर होते ही वॉलीवुड कितना क्यूट हो जाता है!

जब राज ठाकरे के घर जाकर पाँच करोड़ की डील करने वाले कला, अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता, एकता आदि की बात करते हैं तो माहौल एकदम क्यूटाचारी हो जाता है। इतना क्यूटनेस कहाँ से ले आते हैं लोग! अमिताभ बच्चन जब सलमान वाले केस में ये कहते नज़र आते हैं कि ये बहुत ही नेचुरल है कि परिवार अपनों के पीछे खड़ा होता है, और फ़िल्म इंडस्ट्री एक परिवार है, तो लगता है कितनी आदर्शवादी है ये इंडस्ट्री!

ये वही इंडस्ट्री है जिसमें दूसरों की कहानियाँ अपने नाम से लिख दी जाती है। ये वही इंडस्ट्री है जहाँ काम के पैसे सालों तक नहीं दिए जाते। ये वही इंडस्ट्री है जो पूरे साल पाँच ऐसी फ़िल्में नहीं बना पाती जो पाँच साल तक याद रखी जाए।

ये सारा ड्रामा एक मीडियोकर संस्था की परस्पर पीठ-खुजाई से ज्यादा कुछ भी नहीं। छिट-पुट मुद्दों की आड़ लेकर सरकारों और पूरे धर्म को कोसना कोई नई बात नहीं है। इसमें अनुराग कश्यप नए नहीं हैं। वो बस बोल रहे हैं क्योंकि उनको मौका मिला है। आज अचानक से लोग आइ स्टैण्ड विद भंसाली कर रहे हैं और भंसाली ने मन ही मन ‘भक साला’ बोलते हुए ये स्टेटमेण्ट रिलीज़ कर दिया है कि इस फ़िल्म में खिल्जी और पद्मावती के बीच कोई भी रोमांटिक दृश्य नहीं होगा।

इस को अनुराग कश्यप और हमारी भाषा में कहते हैं ‘फट के फ्लावर’ हो जाना। रईस वाले केस में भी फट के फ्लावर हुई थी इंडस्ट्री की, और ‘ऐ दिल है मुश्किल’ के समय भी। तब करण जौहर का जौहर राज ठाकरे के कमरे में बह गया था और छाती पीट-पीट कर ख़ुद को राष्ट्रवादी कहते हुए कह रहे थे कि उनकी फ़िल्म से कितने लोगों को रोज़गार मिलता है आदि आदि।

ये तो बात थी दोगलेपन की, कायरता की और अंततः क्यूटनेस कोशेंट बढ़ाने की।

दूसरी बात है इतिहास या स्थापित कथानकों से छेड़छाड़ की। मैं इस विषय में डिसीजन जनता के ऊपर छोड़ना चाहता हूँ। मतलब ये कि आप पहले बनने दीजिए, और फिर नकार दीजिए। उसकी फ़िल्म अगर खराब है तो पिटेगी और पैसा डूबेगा। लेकिन जनता को भी दोगलई नहीं दिखानी चाहिए कि जब ट्रेडिंग थी तो बायकॉट फ़लाना का हैशटैग चलाया, और जब रिलीज़ हुई तब तक भूल गए कि क्या हैशटैग था।

हैशटैग से बायकॉट तो घंटा नहीं होगा, ना हुआ है आजतक। और हाँ, ये गीत गाना तो सिनेमा वाले या साहित्यकार आदि छोड़ दें कि हमने तो बस नाम लिया है, और उनका इतिहास संदिग्ध है। इतिहास तो मोहम्मद का भी संदिग्ध है और राम का भी। किताबों में पड़े नाम हैं, जिनको समाज अपने हिसाब से जप रहा है।

और एक रचानाकार ये जानता है कि वो नाम सिर्फ नाम नहीं है इसीलिए शार्ली एब्दो के बारह कार्टूनिस्ट की हत्या होती है, आईसिस खड़ा हो जाता है और नाना पाटेकर को ये कहना पड़ता है कि भंसाली को बाजीराव की तलवार को उठाने की बात सोचने भर से बवासीर हो जाएगा।

आप पुराने नाम लेकर नई कहानी लिखते हैं तो देखने वाला, पढ़ने वाला उसे वैसे ही जोड़कर देखता है। आप सीता का पात्र रावण की पत्नी के रूप में नहीं गढ़ सकते या हनुमान जैसी आकृति को अपने हिसाब से नहीं दिखा सकते। दिखा सकते हैं पर आदमी की आस्था और उससे होने वाले रिएक्शन के लिए भी आपको तैयार रहना चाहिए क्योंकि भीड़ की अभिव्यक्ति बड़ी ही निराली होती है, इनोवेटिव भी।

तो भंसाली साहब, कश्यप जी और तमाम मीडियोकर वॉलीवुड के कर्ता-धर्ता लोग, ये गीत गाना बंद करो की मॉब मेंटिलिटी है, हिन्दू एक्सट्रेमिस्ट बाहर उतर आए हैं आदि आदि। क्योंकि आप भी वैचारिक एक्सट्रेमिज्म और अराजकता की ही बात कर रहे हैं। ज्ञानी आदमी विनम्र होता है, वो ज्ञान की आड़ में आक्रमण नहीं करता ये सोचकर कि मेरे साथ तो पचास ज्ञानी खड़े हो जाएँगे।

भीड़ का चेहरा नहीं होता, भीड़ का अपना इतिहास है, अपनी आस्था है। वो सही है या गलत इस पर भी एक फ़िल्म बननी चाहिए।….

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