जहाँ सभ्यताएँ ऐसी रही हैं कि खुदाई में हथियार नहीं मिलते

जब भी ‘पी के’, ‘पद्मावती’ या वैसी कोई भी फ़िल्म आती है जिसमें किसी की भावनाएँ आहत होती हैं, तो एक तर्क हमेशा आता है कि ‘ज़रा मुसलमानों पर बना के दिखा दें फ़िल्म, काट कर रख देंगे।’

अब इस बात को समझिए कि क्या ऐसा करने वाले बहुत ही अच्छे लोग हैं? शार्ली एब्दो या आइसिस क्या इसी का एक रूप नहीं है जिसके कारण यूरोप-अमेरिका में हर दाढ़ी वाले को शक की निगाह से देखा जाता है? क्या आप चाहते हैं कि आपको भी ऐसे ही रूप में याद किया जाय कि ये लोग फ़िल्म बनाने पर काट देते हैं?

इस्लामोफ़ोबिया ग़लत है या सही, इस से बड़ी बात ये है कि ये है, और हर जगह खुले में नहीं तो बंद कमरों में ये बात होती ही है कि मुसलमान तो ऐसे ही होते हैं, मुसलमान तो यही करते हैं, मुसलमान सब ये हैं, वो हैं। ये होता है, और खूब होता है।

‘इंटोलेरेन्स’ वाली हवा याद है? चिदंबरम का ‘भगवा आतंक’ याद है? कैसा लगता है सुनकर? आप एक ‘जय श्री राम’ वाली गमछी ओढ़ लीजिए, या प्रोफ़ाइल में लगाइए और फिर मजाक झेलिए। आपको संघी कहा जाएगा, एक्सट्रेमिस्ट कहा जाएगा, कम्यूनल भी मान लिया जाएगा। किस बात पर? इस पर कि आपके सर पर तिलक है, कंधे पर एक गमछा है?

ये अच्छा नहीं लगता। वामपंथी मीडिया के पुरोधाओं ने चुनावों के समय इस तरह के कई जुमले फैलाए और वो काफी हद तक सफल भी रहे। आपको ग़ुस्सा आएगा, लेकिन आप सबको समझा नहीं सकते कि आप सिर्फ़ अपने धर्म के हिसाब से व्यवहार कर रहे हैं और उसमें आतंक या घृणा नहीं है। जैसे कि मुसलमान ये समझा नहीं पाते की हर दाढ़ी वाला लादेन नहीं है, और उसे बिना बात किए कोई अमेरिकी महिला ट्रेन की पटरी पर ढकेल देती है।

जब आप ये कहते हैं कि ‘पैग़म्बर पर बना कर दिखाए, क्या हाल होगा दिख जाएगा’, तब आप भूल जाते हैं कि देश का क़ानून इस बात की इजाज़त नहीं देता कि आप इस्लाम या उसके पैग़म्बरों का अपमान करें। आपको देश के क़ानून का, जब तक आपके मतलब का न बन जाय, पालन करना चाहिए।

दूसरी बात ये है कि कोई और सड़क पर जाते हर आदमी पर कीचड़ फेंक देता है तो आप भी फेंकने लगें, ये मूर्खता है। जिस समाज की आप बात कर रहे हैं, उसकी जड़ों में सहिष्णुता, समावेश और दूसरों के प्रति सम्मान का भाव सनातन काल से है। आपने आक्रमणकारियों को भी बसने की ज़मीन दी। ये ग़लत साबित हुआ या सही, वो अलग डिबेट है, लेकिन हम कौन हैं ये पहचानिए। कम से कम हमारे समाज में उस हद की घृणा तो नहीं है जो अमेरिका-यूरोप में देखने को मिलती है, और उस आग से हजार साल से बचे हुए तो हैं।

खुद को उन जैसा मत बनाइए कि आपके ‘जय श्री राम’ कहने से बाज़ार में भगदड़ मच जाए कि ये आतंकी है जिसने सुसाइड व्हेस्ट पहन रखा है। समाज को बाँधे रखना आसान नहीं है। आप पर ज़ुल्म हो तो मत सहिए, लेकिन कल्पना के आधार पर, चार लोगों के उकसाने पर, आगज़नी और हिंसा मत कीजिए।

ये बुनियादी तौर पर ग़लत है। बिना बात का सहना भी गलत है, और बिना बात के हो-हल्ला करना भी। जहाँ लड़ाई की आवश्यकता है, बेशक हथियार उठा लीजिए, लेकिन तय कीजिए कि हर बात पर लड़ाई ज़रूरी है क्या? अपनी गहरी, फैली जड़ों से नमी खींचिए। आप भारत के हैं जहाँ सभ्यताएँ ऐसी रही हैं कि खुदाई में हथियार नहीं मिलते।

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