‘मुझे कौन-सी किताब पढ़नी चाहिए’

किताबों के बारे में अक्सर लोग ये पूछते पाए जाते हैं कि वो क्या पढ़ें। फिर हम, आप और बाकी लोग मिलकर उसे एक पुस्तकालय बनाकर दे देते हैं। आदमी हो सकता है, सीरियस हो पढ़ने को लेकर तो, किताबें ख़रीदकर भी ले आए। अब यहाँ परेशानी यह है कि हम सामने वाले को कई बार जानते नहीं हैं, लेकिन ये बात अच्छे से जानते हैं कि हर आदमी को हर किताब सही नहीं लग सकती।

इसलिए जो आदमी रिकमेंडेशन माँगते हों, उन्हें हमेशा ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि क्या आप अजीत भारती पर इतना विश्वास रखते हैं कि वो जो कहे आपको सही लगेगा? अपनी रुचि और सामने वाले की रुचि, उसके स्वभाव और लेखन से थोड़ा अंदाज़ा लगाना चाहिए कि क्या इसके द्वारा पढ़ी किताब मेरे लिए भी सही होगी?

इतने पर भी आप निर्णय करने में असमर्थ हों तो किताबों की समीक्षाएँ पढ़ लीजिए। समीक्षा का मतलब एमेजॉन रिव्यू से नहीं है। थोड़ी लम्बी वाली, जिसमें किताब का मूल कथानक, पात्रों की बात, परिस्थितियों की बात, संवादों की बात और सामाजिक प्रासंगिकता को लेकर बातें की गई हों। नई किताबों के लिए ये ढूँढना मुश्किल है, पर पुरानी के लिए आराम ही आराम है।

नई किताबों के लिए जो बेहतर उपाय है, वो यह है कि आप उन लेखकों को सोशल मीडिया पर भी पढ़ें, अगर वो लिखते हों तो। नहीं तो उनके विचार कहीं से मिलें, उसे पढ़ें। उसके बाद उनकी पुस्तकों की समीक्षाएँ, सोशल मीडिया पर ही मिले, तो उसको भी एक नज़र देख लें। थोड़ा-सा सर्च करने से वो मिल जाएगा। सोशल मीडिया पर ज़्यादातर लोग कहानी बता देते हैं, उससे भी आपको, चूँकि कथानक हमारे समय का है, तो फ़ैसला करने में आसानी हो जाएगी कि पढ़ना है कि नहीं।

जैसे हर आदमी गोविन्दा की फ़िल्म देखकर हँसते हुए खटिया से गिर नहीं सकता, वैसे ही हर व्यक्ति एक ही किताब से उसी मात्रा में आनंद नहीं पा सकता। जो आपकी पसंद है, वो दूसरों के लिए कोरी बकवास होगी। इसलिए, अपनी पसंद देखिए।

दूसरी बात, यह आप मान लीजिए कि हर आदमी किताब नहीं पढ़ना चाहता। ये बहुत ही सामान्य बात है। जैसे कि हर व्यक्ति को गाने सुनना पसंद नहीं। हर व्यक्ति को आर्ट देखने में रुचि नहीं होती। हर कोई सिनेमा के लिए हार्ड डिस्क लेकर डाउनलोड करने के फेर में नहीं रहता। उसी तरह, हर व्यक्ति को प्रेशर में आकर किताब भी नहीं पढ़नी चाहिए।

इससे आप छोटे या बड़े नहीं हो जाएँगे। ये एक बेहद ही निजी चुनाव है, जिसका बाकी लोग क्या कर रहे हैं इससे को वास्ता नहीं। किताब पढ़ने से आपकी ज़िंदगी बेहतर तभी होगी जब आप उसे समझ पाएँगे। सिर्फ़ ये कहने को लिए कि ‘मैं साल के डेढ़ सौ किताबें पढ़ लेता हूँ’, लेकिन लिखते हैं तो लगता है तीन भी नहीं पढ़ी होगी, किताबें मत ख़रीदिए। कुछ और कर लीजिए उस पैसे का।

मैंने देखा है लोगों को जो किसी विषय पर बात करेंगे तो किसी दृष्टिकोण से नहीं लगते कि ये जो ऑफिस में हर दिन तीन किताबें लिए आते हैं, एक भी पढ़ते होंगे। मेरे ऑफिस में एक बंधु थे, जो पता नहीं क्यों, हर दूसरे दिन तीन नई किताब ख़रीद लेते थे और मुझसे पूछते थे कि फ़लाँ को पढ़ा है? अंग्रेज़ी नाम फेंककर दबाव बनाने का प्रयास! हम सीधा कह देते नहीं तो वो कहते कि पढ़ा करो। सीनियर आदमी से जिरह नहीं करता था, क्योंकि वो हमको चाय बहुत पिलाते थे।

किताबें एक तरह से आपको वहाँ ले जाती हैं, जहाँ आपकी कल्पनाओं में आप खुद को, अपनी परिस्थितियों को, अपने दोस्तों को, या अपने मनोभावों को मूर्त होते देखना चाहते हैं। आपको अपनापन लगता है। शुरुआत यहीं से होती है कि आपको कुछ अच्छा लगता है। फिर जब हम सीखने लगते हैं, पात्रों को देखते और समझने लगते हैं तो हम तुलना शुरु करते हैं। ये दूसरा चरण है आलोचनात्मक प्रशंसा करने हेतु।

तुलना करने का मतलब है कि हमारे पास पहले से भी कुछ है। इसका मतलब है कि आपने जो पढ़ा है, वो प्रोसेस हो चुका है। फिर आप शिल्प, शब्द, वाक्य आदि के स्तर पर किताबों को देखने लगते हैं। क्या वो आपके मन मुताबिक़ है, क्या वो वैसा है जैसा किसी और किताब में था। ये थोड़ा आगे ले आता है आपको एक पाठक के तौर पर। अब आप अडवान्स मोड में आ जाते हैं।

जितना पढ़ते जाएँगे, समझते जाएँगे, आपकी सोच और समझ का दायरा व्यापक होता जाएगा। आपको फिर साहित्य और मनोरंजन में अंतर नज़र आने लगेगा। फिर आपको ये समझ में आएगा कि ‘वांटेड’ और ‘प्यासा’ में क्या अंतर है। साथ ही, आप इस बात को भी सहजता से स्वीकार पाएँगे कि हर तरह की किताब के लिए हर तरह के पाठक हैं।

कोई क्या पढ़ रहा है, इस पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। जिसकी जैसी सोच है, जैसी शिक्षा है, जैसा परिवेश है, वो उसी तरह की रचनाओं का आनंद उठाता है। ज़रूरी नहीं कि गोविन्दा की फ़िल्में देखने वाले के ज्ञान का स्तर कम हो। ये उसका चुनाव है कि उसे मनोरंजन चाहिए। हम अगर सलमान की दबंग देखकर अपना मनोरंजन करते हैं तो इसका क़तई मतलब नहीं कि हमें समझ नहीं है या दिमाग़ी स्तर से हम पैदल हैं।

उसी तरह, आप अगर चेतन भगत पढ़ते हों, अमीष को पढ़ते हों, शेक्सपीयर को पढ़ते हों, या नेरूदा को, कोई भी, किसी से हीन या बेहतर नहीं है। जिसको जो पसंद आए पढ़ना चाहिए। हाँ, कुछ साहित्यिक कसौटियाँ हैं, जिनपर हर किताब समान रूप से नंबर नहीं पा सकती। मनोरंजक उपन्यास, गम्भीर साहित्य हो ज़रूरी नहीं। हो भी सकता है, नहीं भी। साथ ही, किसी किताब की करोड़ों प्रतियाँ बिक जाने से वो साहित्यिक स्तर पर बेहतरीन नहीं हो जाती। हो भी सकती है, नहीं भी।

पढ़ने में, या न पढ़ने में, संकोच नहीं करना चाहिए। हर आदमी पढ़ने को लिए नहीं बना होता। आपको मन नहीं करता, या आप बैठकर पढ़ नहीं पाते तो आपमें कोई ख़राबी नहीं है, आप किसी और तरह से खुद के ज्ञान में वृद्धि करते होंगे। या नहीं ही करते होंगे, तो भी ग़लत नहीं। हर आदमी जब कुदाल लेकर खेती नहीं करता, जो कि जीने के लिए ज़रूर कौशल है, तो हर आदमी पढ़े क्यों?

फिर भी, जो पढ़ना चाहते हैं, वो पढ़ें। दूसरों से सहायता लेते रहें। क्योंकि हाथ पकड़ाएँगे, तभी तो आगे जा पाएँगे। आप भी पढ़िए, इच्छा हो तो, दूसरों को भी पढ़ाइए। अपनी रुचि और सामने वाले की रुचि के हिसाब से किताबें रिकमेंड कीजिए। किताबें न सही तो फ़िल्में, टीवी सिरीज़, संगीत आदि भी रिकमेंड करते रहिए। ज्ञान की धारा बढ़ती रहनी चाहिए जो किताबों के अलावा भी कई तरह से चलती रहती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *