मेरा समर्थन भाजपा या मोदी को क्यों है?

कुछ लोगों की सच्ची परेशानियाँ हो सकती हैं, इससे इनकार नहीं है। लेकिन उसके अलावा दो तरह के लोग सिर्फ़ भाजपा सरकारों की तथाकथित नाकामियाँ गिनाते नज़र आते हैं। पहले वो हैं जिन्हें ये विश्वास है कि किम जोंग उन कॉमरेड हैं, और बेहतरीन वर्ल्ड लीडर है जिसे शांति का नोबेल मिलना चाहिए, और वो राहुल गाँधी या चोरों के गठबंधन तक को समर्थन देने को तैयार हो जाते हैं। 

ये बड़े घाघ लोग हैं। ये मोदी के नुकसान पर रोज लिखते हैं, लेकिन उसको किसके रेफरेंस में नुकसान मानते हैं, कमतर मानते हैं, वो नहीं बता पाते। ऐसे लोगों पर कुछ लिखना भी बेकार है क्योंकि ये उस लायक नहीं हैं कि इन पर दो पैराग्राफ़ से ज़्यादा लिखा जाए। 

दूसरी तरह के लोग वो हैं ये मानते हैं कि उनके घर के सामने की सड़क टूटी हुई है तो भारत में कहीं भी सड़क सही नहीं है। ये वो लोग हैं जिनको कहाँ क्या हो रहा है से मतलब नहीं है, उनको बस ये लगता है कि जो सुविधा उनको नहीं मिल रही, या वो लेने भी नहीं गए, तो वो भारत में कहीं नहीं है। ये यूपी के लखनऊ एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाकर ये कह देते हैं कि देखो अखिलेश-मायावती ने कितना बेहतरीन काम किया है, मोदी ने क्या किया। 

ये पढ़े लिखे लोग हैं जो सेलेक्टिव तरीक़े से बात रखते हैं। ये मानने को तैयार नहीं है कि सड़के और हाइवे, ईवे उस तेज़ी से बन रही हैं, जो कि पहले कभी नहीं बनी। ये लोग तीन गाँव में बिजली नहीं पहुँचने पर बवाल काटते हैं और फिर इस रिपोर्ट को नकार देते हैं जो कहती है कि इस सरकार ने दुनिया में सबसे ज़्यादा तेज़ी से घरों में बिजली पहुँचाई है। 

अंततः बात वही है कि कोई भी सरकार हर काम बेहतरीन तरीक़े से नहीं करती है। अगर किया हो तो उसका रेफरेंस दिया जाना चाहिए। लोग जब तुलना करते हैं सिर्फ एक आयाम गिना देते हैं जिसमें वो जीतते नज़र आते हैं। इनके लिए एक निर्णय जो ठीक न रहा हो, पूरे कार्यकाल की सारी उपलब्धियों को शून्य कर देता है। 

ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है। ये सिर्फ डिबेट में उलझने के लिए, आपको उकसाने के लिए आते हैं। इनको देश या समाज की तरक़्क़ी से कोई मतलब नहीं। ये वोट देने नहीं जाते। खुद वो तमाम चीज़ें करते हैं जो अनैतिक हो, ग़ैरक़ानूनी हो, लेकिन उनका काम बन जा रहा हो। आदर्शवादी फेसबुक की वाल पर ही बना जा सकता है, निजी जीवन में ये लोग बहुत ही बेकार हैं। 

ऐसे लोगों की आदर्शवादी बातें सुनकर घिन आती है। मैं आदर्शवादी नहीं हूँ, न ही तंत्र के रातोंरात बदलने की आशा दिखाता हूँ। लेकिन मुझे ये नकली चोग़ा पहनकर लोगों के बीच में लाइक बटोरने की, या दिन रात नकारात्मकता में जीने की कोई इच्छा नहीं है। इसलिए मुझे कॉन्ग्रेस-जेडीएस का गठबंधन भी संवैधानिक लगता है और गोवा में भाजपा वाला भी। मैं एक जगह खुश होकर ताली नहीं पीटता और दूसरी जगह गरियाता नहीं कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है। 

उसके लिए स्पेशल टाइप का टैलेंट चाहिए, जो कि मुझमें न है, न होगी। मेरे भाजपा समर्थन का सीधा फ़ंडा है कि ये तमाम विकल्पों में सबसे बेहतर है। मुझे लगता है, और दिखता है कि पिछली सरकारों की अपेक्षा ये बेहतर काम कर रही है। मैं एक बलात्कार में धर्म नहीं खोजता, न ही ये मानता हूँ कि किसी सामाजिक हिंसा की जड़ में मोदी और अमित शाह का फोन कॉल होता है। 

जिन्हें ऐसा लगता है वो आठ कथित हिन्दू बलात्कारियों को पूरे हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि मान लेते हैं, और उसे सीधे मोदी और शाह से जोड़ लेते हैं। मेरे लिए या नहीं है। मैं तब सवाल करता हूँ जब आप कठुआ में संवेदनशील हो जाते हैं, और गीता पर चुप। तब मैं धर्म की बात करके आपसे पूछता हूँ कि ये दोगलापन कहाँ से आता है? 

इसलिए, मुझे वो सब दिखता है जो हो रहा है। बात यह है कि ये सरकार ग़रीबों के लिए जितनी सब्सिडी दे रही है, और इसके विरोधी जिस तरह की ख़बरें फैलाकर दलितों से दंगे कराकर बारह लोगों की जान ले लेते हैं, उसके कारण इस सरकार का नुकसान ही हो रहा है। जितने साम्प्रदायिक कार्य तथाकथित सेकुलर लोग खुलकर कर रहे हैं, उतना तो भाजपा कर ही नहीं रही। जबकि सत्य ये है कि सिर्फ हिंदुत्व का कार्ड खेलकर भाजपा फिर से सरकार बना सकती है, और उसको इस रिपोर्ट कार्ड की ज़रूरत नहीं। 

वो विकास की बातें न करे, सिर्फ ये कहती फिरे कि हिंदुओं के रहने और जीने के लिए बेहतर व्यवस्था करेंगे तो भी जीत जाएँगे। उसको मदरसा आधुनिकीकरण, मुसलमान बच्चों को छात्रवृतियाँ देने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उसको चर्चों के पादरियों से मिलकर फोटो लगाने की, रमज़ान में सीज़फायर या मोहम्मद को शांति का मसीहा बताने की कोई ज़रूरत नहीं। लेकिन वो ‘सबका साथ, सबका विकास’ अजेंडे को कम से कम ‘गरीबी हटाओ’ के सत्तर साल पुराने नारे से ज़्यादा गम्भीरता से लेती है। 

जबकि बाक़ियों को कभी किसी उलेमा के फ़तवे, किसी पादरी के प्रार्थना की तो कभी किसी मस्जिद के मौलाना के खुल्लमखुल्ला सपोर्ट की ज़रूरत पड़ जाती है। कोई बैलेट बॉक्स में आग लगाकर, लूटकर चुनाव करवा रहा है, और नब्बे प्रतिशत सीटें जीतने का दावा भी करता है। कोई अपने बाप को जेल भिजवाने को गलत मानते हुए भी उस आदमी के बेटे के शपथग्रहण में जाता है जिसने केस करवाया था। कोई किसी का बेटा होने भर के टैलेंट से पीएम बनने का सपना देख रहा है। 

कोई एक दिन सुप्रीमकोर्ट को कठपुतली मानता है, महाभियोग लाता है, और अगले दिन उसके फ़ैसले को लोकतंत्र हितकारी कहते हुए नाचने लगता है। कोई एक चुनाव में ईवीएम हैकिंग की बात करता है, लेकिन जब खुद जीतता है तो उस पर एक शब्द नहीं बोला जाता। 

ऐसे लोगों के बीच तमाम ख़ामियों के बावजूद अगर भाजपा लगातार लोगों का विश्वास जीत रही है तो मुझे उस बहुमतदायिनी जनता के फ़ैसले पर सवाल करने का कोई हक़ नहीं क्योंकि वही रास्ता संवैधानिक है। जो भी ज़्यादा वोट लाएगा उसकी नीतियाँ सही हैं। सारी नीतियाँ सही न हों, पर लोग लार्जर पिक्चर देखते हुए उसे चुन रहे हैं। यही लोकतंत्र है, और इसमें भाजपा मुझे सबसे बेहतर विकल्प दिखती है। इसे अगले दस साल और चाहिए, देश की सूरत बदलने को लिए। जिसको कोई और सही लगता है, वो दिल्ली से ट्रेन पकड़कर गाँव जाकर वोट देना शुरु करे, फिर बात करे। 

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