हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले रोहिंग्या को भारत में शरण क्यों?

एमनेस्टी इंटरनेशनल, जो कि आधे समय फ़र्ज़ी बातें करती नज़र आती है और ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों को मानवाधिकार के दायरे में समेटने की फ़िराक़ में रहती है, उसने आज एक रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि रोहिंग्या मुसलमानों ने राखिने में हिन्दू अल्पसंख्यकों को समूहों में काटने की वारदातों को अंजाम दिया है। 

ये हिन्दू अंग्रेज़ों द्वारा कामगारों के रूप में भारत से ले जाए गए थे और फिर वही हुआ जो हर मुसलमान देश में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ होता है। ये कोई दिमाग़ी कल्पना नहीं है, सबसे पास पाकिस्तान और बंग्लादेश में हिन्दुओं की क्या हालत है, वो देखने के लिए उपलब्ध है। 

यहाँ उदारवादी नीति का मतलब है अपनी आंतरिक सुरक्षा से खिलवाड़ वो भी तब जब नक्सली और कट्टरपंथी इस्लामी आतंक से सुरक्षा बल कई इलाकों में जूझ रहे हैं। इस्लामी आतंक इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि ‘कुछ सिरफिरों की हरकत’ वाली बातें अब पुरानी हो गई है। ऐसी घटनाओं पर बुद्धिजीवियों की चुप्पी और इस्लाम समाज का मौन बहुत कुछ कहता है। आतंकियों के जनाजों में लगती भीड़ कहती है कि इनको समर्थन है। 

साथ ही ये कहना ग़लत है कि सारे लोग गुनहगार ही हैं लेकिन जैसे दलितों, गौरक्षकों की हिंसा पर हिन्दू समाज मुखर होकर धिक्कारता है, वो मुखरता तो दूर इस बात को स्वीकारना भी नहीं दिखता कि उनके हिंसा की जड़ें सीधे धर्म से जुड़ी हैं। हिन्दुओं को कभी ये कहते नहीं सुना कि दलितों को पीटने वाले सिरफिरे युवा हैं। वो हमेशा ये कहते नज़र आते हैं कि इनको सजा मिलनी चाहिए। सिरफिरा कहकर पल्लू झाड़ना एक मौन सहमति है। 

रोहिंग्या की मिलिटेंट आर्मी ने हिन्दुओं को जगह-जगह जाकर काटना शुरु किया और ऐसा आतंक मचाया कि वहाँ के बौद्ध लोगों को हथियार उठाना पड़ गया। बौद्ध लोगों को वर्चस्व के लिए नहीं, अस्तित्व के लिए हथियार उठाना पड़ा, वहीं इस्लामी आतंक वर्चस्व और ‘हम दुनिया को क़दमों में और इस्लाम की ख़िलाफ़त के अंदर लाना चाहते हैं’ की तर्ज़ पर चलता है। 

इसलिए ये कह देना कि ‘हिंसा तो दोनों कर रहे हैं’ गलत है। एक आत्मरक्षा है, दूसरा दूसरों को हीन समझकर आतंक मचाकर रक्तपात करना है। ऐसे लोगों को वैसे देश में बसाना जानबूझकर ख़तरा लेना है क्योंकि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इसी शरणार्थी भीड़ में वो आतंकी भी हों जो किसी दिन यहाँ के कट्टरपंथियों के साथ मिलकर देशद्रोह में योगदान न दें। 

असम में पचास लाख बंग्लादेशी मुसलमानों से पूरी जनसंख्या का क्या हुआ वो हमारे सामने है। किंगमेकर बनकर लगातार घुसपैठ ज़ारी रखवाकर यहाँ की नागरिकता हासिल करने के बाद पूरे उत्तर भारत में इनके फैलाव की घटनाएँ सामने आती रही हैं। ये शरणार्थी की तरह व्यवहार नहीं करते, बल्कि जहाँ संख्या अधिक हो, वहाँ हिंसा करने से नहीं चूकते। हमारी राजनीतिक पार्टियों ने इनको खूब संरक्षण दिया और वोट के लिए खूब इस्तेमाल किया है। 

अब जाकर इनके लिए व्यवस्था हो रही है। एमनेस्टी का ये स्वीकारना कि इन्होंने हिन्दू अल्पसंख्यकों का नरसंहार किया है, बहुत बड़ी बात है। साथ ही रोहिंग्या मुसलमानों का कश्मीर और राजस्थान तक पहुँचा दिया जाना बड़ी साज़िश की तरफ इशारा करता है जिसमें डेमोग्रफी को बदलने से लेकर आतंक फैलाने तक के लिए इनके प्रयोग की पूरी संभावना है। साथ ही, भारत में एक और बंग्लादेश नहीं बसाना। 

ये जहाँ के हैं, वहाँ भेजा जाए या फिर वैसे देशों में जहाँ इनका धर्म राजकीय धर्म हो। इस्लामी राष्ट्रों को आगे बढ़कर इन मुसलमान शरणार्थियों को, बंग्लादेशियों के साथ अपने यहाँ बसाना चाहिए। या फिर यूएन को कुछ जगहों पर इनके रहने खाने की व्यवस्था करनी चाहिए। ये व्यवस्था वहाँ होनी चाहिए जहाँ संसाधनों की प्रचुरता हो, जनसंख्या की कमी हो, वर्कफोर्स की ज़रूरत हो। भारत में न तो संसाधन प्रचूर मात्रा में हैं, न जनसंख्या की कमी है, न ही रोजगार ज़्यादा है। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *