लिखने की प्रक्रिया: चाय के कप और होंठों तक कई फिसलनें हैं

लिखना कभी-कभी बहुत आसान होता है। आप लिखने बैठे और टाइप करते चले जाते हैं। कई बार कहानी, पात्र और परिस्थितियाँ जैसे-जैसे मैं टाइप करता जाता हूँ, बनती जाती हैं। उनमें आयाम जुड़ते जाते हैं। ये सब ऑन द गो होता रहता है।

फिर कभी ऐसा भी होता है कि आपको पता है कि कहानी क्या है, पात्र क्या हैं, किन परिस्थितियों में वो फँसेंगे, कैसे निकलेंगे, लेकिन जब आप लिखने बेठते हैं तो दो-तीन पैराग्राफ़ के बाद आगे नहीं बढ़ पाते। यहाँ कोई ब्लॉक नहीं है दिमाग में। लगता है कि कुछ रह रहा है। 

कहानी को उनके मूलभूत अंगों से (पात्र, ढाँचे और परिस्थितियाँ) संपूर्णता नहीं मिलती। ये मिनैण्डर के रथ की तरह है। रथ के अंगों से ही रथ नहीं बनता। उसका एक सहज और स्पष्ट तरीक़े से सामंजस्य में होने से वो रथ बनता है। पूर्णता के लिए अवयवों का एक निश्चित तरीक़े में होना भी मायने रखता है। 

दो-तीन दिनों से कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं हो रही थी। न तो फ़ेसबुक पर, न ही मेरी अगली कहानी-संग्रह के लिए। मूड भी है, कहानी भी है, टाइप करने की स्थिति में भी हूँ, लेकिन लिखने बैठो और लिखो तो लगता है कुछ रह गया है। एक कहानी को तीन तरीक़ों से लिखने की कोशिश कर चुका हूँ। लेकिन तीन पैराग्राफ़ से आगे बात नहीं बढ़ी। 

जबकि मैं चाहूँ तो उसे हर तीन तरीक़े से पूरा कर सकता हूँ और लोग पढ़ भी लेंगे। लेकिन ये धोखेबाज़ी है और किसी की अनभिज्ञता का लाभ उठाना है। पाठक को कहानी चाहिए, उसे रस मिलना चाहिए। लेकिन उन्हीं पाठकों में वो लोग भी होते हैं जो आपको आपकी कहानियों की आलोचना के ज़रिए बताते हैं कि क्या रह गया, क्या बेहतर किया जा सकता है।

इसलिए आत्मसंतुष्टि बहुत ज़रूरी है। इसीलिए लेखकों के बारे में ये सुना जाता है कि पन्ने लिखे जाते रहे, फाड़े जाते रहे। हम में ये शक्ति होनी चाहिए कि हम अपने आप से संतुष्ट न हों, जब तक आप उस दिन, उस कहानी को बेहतरीन संभव आकार नहीं देते, तब तक उसे किसी को मत पढ़ाइए। पहले आप संतुष्ट हो लीजिए, फिर उनके पास जाइए जिनको समझ है, जिनका एक नज़रिया है। 

उनकी बातें सुनिए और फिर अपने आकलन से संतुष्ट होने के बाद उसमें सुधार कीजिए। सुधार के लिए कमियों को समझना बहुत ज़रूरी है। कहने का तात्पर्य यह है कि सामने वाला आपका शिक्षक है, आपसे ज़्यादा अनुभवी है, आपका शुभेच्छु है, लेकिन उनकी बातों को भी पूरी तरह समझे बिना कहानी में बदलाव करना नासमझी है। कहानी का प्रस्फुटन आपके अंदर हुआ है, आपको पता है कि उसको कैसा पोषण चाहिए, आप उसे समझते हैं। इसलिए आपका सामने वाले की बातों को पूरी तरह से समझना ज़रूरी हो जाता है। 

जब तक आप सामने वाले के सुझाव से संतुष्ट नहीं है, उनसे ज़िरह कीजिए। स्वीकारिए कि आपकी रचना में कमी है, और उनकी बातों पर खुद को एक्सप्लेन कीजिए कि ये आपने इस आधार पर लिखा था। चर्चा से कई तरह की बातें निकलकर आती हैं। जिस कहानी से आप पूरी तरह से संतुष्ट हैं, उसे आप डिफ़ेंड करने की स्थिति में होते हैं। फिर भी हमारे सीमित अनुभवों के कारण कई बार हमारे मित्र, शिक्षक आदि को वो दिख जाता है जो हमें नहीं दिखता। वहाँ पर समझिए, चर्चा कीजिए और फिर सुधार कीजिए। 

मैं चौथी बार एक कहानी को आकार देने बैठा हूँ। इसके मूल में जो बात है, वो इतनी कॉम्पलेक्स है, और समाज में इतनी आम है पर खुलकर बोली नहीं जाती। इस कारण से इसका ट्रीटमेंट सही नहीं होगा तो पाठकों तक वो बात अपनी संपूर्णता में नहीं पहुँच पाएगी। सही ट्रीटमेंट बहुत ज़रूरी होता है, वरना कहानी की जगह वो अक्षरों के झुंड से बने शब्द, शब्दों के झुंड से बने वाक्य, वाक्यों के झुंड से बने पैराग्राफ़ और पैराग्राफ़ों के झुंड से बने छपे पन्नों से ज़्यादा कुछ नहीं हो पाएगा। 

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