योगी आदित्यनाथ एक स्टेटमेण्ट है कुछ पॉलिसी के लिए, कुछ पार्टियों और सरकारों के लिए

मैं योगी आदित्यनाथ का कोई फ़ैन नहीं हूँ। ना ही भाजपा का सदस्य हूँ। ये बात और है कि वोट या तो भाजपा को दिया है, या गठबंधन में जद(यू) को। ना ही मुझे मुसलमानों से कोई द्वेष है। ये बातें कई बार साफ़ कर देना ज़रूरी हो जाता है।

मैं हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूँ। मुझे जो सांस्कृतिक विरासत मिली है, उस पर गर्व है। मुझे भारत के इतिहास के कई हिस्सों पर गर्व है। मैं ये भी जानता हूँ कि मुसलमान इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं। मैं ये भी जानता हूँ कि उनका सामाजिक स्तर सत्तर सालों में कुछ ज़्यादा नहीं उठा है। वही हाल दलितों का भी है और स्त्रियों का भी।

फिर मैं योगी आदित्यनाथ के, जिसकी छवि एक कट्टर हिन्दू नेता की है, मुख्यमंत्री बनने पर ख़ुश क्यों हूँ? मेरे पिछले स्टेटस के कारण कई लोगों ने मुझे ब्लॉक किया होगा, अनफॉलो किया होगा, और कईयों ने एक राय बना ली होगी कि मैं क्या हूँ। ख़ैर, मैं ख़ुश क्यों हूँ?

इसका जवाब देता हूँ, पहले माहौल बना लिया जाय। आपको पता है कि मुसलमानों की, दलितों की, लड़कियों की वर्तमान विचारणीय दशा का ज़िम्मेदार कौन है? क्या आपको पता है कि किसी राज्य में पचास प्रतिशत नंबर लाने पर मुसलमानों को ‘टैलेंट’ स्कॉलरशिप का प्रावधान है? क्या आपको पता है कि जब पीएम ये कहता है कि बिजली भी धर्म और त्योहार देख कर दी जाती है तो वो बात बहुत बड़ा सत्य है? क्या आपको पता है कि मंदिरों के लाउडस्पीकर उतरवा लिए जाते हैं, मंदिरों में मंगलवार को घंटियाँ ना बजे इस के लिए पुलिस तैनात रहती है?

ये सब उदाहरण हैं। मुसलमानों के लिए अलग से पॉलिसी बने उससे मुझे दिक़्क़त नहीं है। मुझे दिक़्क़त है कि आधारभूत सुविधाएँ मुहैय्या कराने में सरकारें (ख़ासकर यूपी और बंगाल) जानबूझकर एक पूरे वर्ग को अलग कर देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली आदि पर सबका हक़ है, क्योंकि सबको ज़रूरत है। यूपी और बंगाल में ही ग़रीबों और दलितों की संख्या मुसलमानों से कहीं अधिक है, लेकिन उनके लिए समय और धन निकालने में उतनी तत्परता नहीं दिखती।

क्या कारण है कि जाति और धर्म के नाम पर तुष्टिकरण की हद इतनी है कि छः हज़ार चयन में पाँच हज़ार ‘यादव’ उपनाम वाले होते हैं? क्या कारण है कि खुलेआम गुण्डागर्दी करने वाला ‘समुदाय विशेष’ का व्यक्ति मथुरा काण्ड में पुलिस को ही मार देता है और आपके ही राज्य में एक एलग राज्य बनाकर रहने लगता है?

सामाजिक उत्थान ज़रूरी है, धर्मगत उत्थान नहीं। माइनॉरिटी को लॉलीपॉप थमाकर, आप मेजोरिटी की पीठ पर लात देकर बहुत ज़्यादा दिन बैठे नहीं रहते। कैराना में क्या हुआ सबको पता है। मालदा में क्या हुआ सबको पता है। वर्धमान में क्या हुआ सबके सामने है। और ताज़ा-ताज़ा धूलागढ़ में क्या हुआ सबको पता है।

जब आप मोदी को गुजरात के लिए आजतक नहीं छोड़ते तो फिर मुज़फ़्फ़रनगर के लिए अखिलेश, मुलायम क्यों ज़िम्मेदार नहीं हैं? मालदा, धूलागढ़ से पूर्णियाँ तक होने वाले दंगों में हिन्दुओं के जलते घरों के लिए क्या ममता ज़िम्मेदार नहीं है? ज़िम्मेदार है। और जनता को ये फ़ैसला लेने का मौक़ा आता है।

इसीलिए जब ऐसे घृणित मानसिकता वाले सत्तालोलुप मुख्यमंत्रियों और पार्टियों के तुष्टिकरण की सीमा चरम तक चली जाती है तो लोग विकल्प तलाशते हैं। क्योंकि लोगों को पता है कि दंगे से मुसलमानों के घर में समृद्धि और शिक्षा नहीं आएगी। तुष्टिकरण से दलितों के घर तक सड़क नहीं जाएगी।

उनके सामने देश का उदाहरण है जहाँ एक प्रधानमंत्री रोज़ गाली सुनता है लेकिन काम किए जा रहा है। जो अंधे हैं, उन्हें नहीं दिखेगा क्योंकि असली काम तो मनमोहन-सोनिया के काल में हुआ था। जो बहरे हैं उनको उन दंगों की चीख़ सुनाई नहीं देगी जो सपा, काँग्रेस, राजद, तृणमूल आदि के कार्यकाल में होता रहा। जो मानसिक रूप से विकलाँग हैं उन्हें ये नहीं दिखेगा कि सुप्रीम कोर्ट और इलेक्शन कमीशन की मनाही के बाद भी कोई मुसलमानों को एकजुट होने कहता है तो कोई दलितों को सवर्णों के ख़िलाफ़ उकसाता है, लेकिन साम्प्रदायिक होने का ठीकरा एक ही पार्टी के सर पर है।

लेकिन अब लोग पक गए हैं इससे। अब लोगों को सड़कें चाहिए, बिजली चाहिए, अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिए, शिक्षक चाहिए। उन्हें रोज़गार चाहिए। जो सरकार ये कार्य करेगी, या करती दिखेगी उस पार्टी को वोट मिलेगा। यूपी का जनादेश जिन्हें नहीं पच रहा है वो वहाँ की जनता के चयन को उनकी मूर्खता समझते हैं। उनको लगता है कि वो ज़्यादा बुद्धिमान हैं और विधायकों का चयन उनसे पूछ कर होना चाहिए था। जिन्हें योगी आदित्यनाथ के बयानों से दिक़्क़त है, वो आज़म, ओवैशी, तिलक-तराज़ू वाली माया और एम-वाय कॉम्बिनेशन के पुरोधा मुलायम की बातों को, कुकर्मों को याद कर लें।

इस घटिया स्थिति से निपटने के लिए यूपी को एक ऐसा नेता चाहिए जो कि पूरे राज्य को शून्य से शुरू करे। यूपी की क़ानून व्यवस्था कैसी है, उसका जवाब कोई भी यूपी वाला दे सकेगा। वहाँ के हिन्दुओं को कैसे सताया गया, ये ख़बरें मीडिया में खोजने पर मिल जाएँगी। वहाँ के मुसलमानों को कैसे ठगा जाता रहा, ये आप नेताओं के बयानों और उनके पाँच साल के कार्यकाल से मिलाने पर समझ जाएँगे।

इसीलिए, मुझे योगी आदित्यनाथ के चुनाव पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। जैसे ममता मुसलमानों का चेहरा है, मुलायम मुसलमानों के मसीहा हैं, वैसे ही हिन्दू समाज के किसी कट्टर मसीहा के आने से क्या दिक़्क़त है। दिक़्क़त तब होगी जब वो गुण्डागर्दी को बढ़ावा देगा, दंगे कराएगा और अपने जूते हवाई जहाज़ से मँगवाएगा।

तब तक के लिए मैं अपने फ़ैसले सुरक्षित रखता हूँ। कम से कम पहला प्रेस कॉन्फ़्रेंस तो देख लीजिएगा, पहला महीना तो देख लीजिए, एक साल का काम देखिए, फिर उसको हिन्दुवादी, कट्टर आदि विशेषणों से नवाजिएगा। अभी घोड़े के पीठ पर बैठिए, उसके मुँह पर मत जाईए कि कैसा है।….

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